Bihar News : साल 2009... मई का महीना... लोकसभा चुनाव के नतीजे आ रहे थे। पूरे देश की नजरें चुनावी तस्वीर पर थीं, लेकिन बिहार में सबसे ज्यादा चर्चा हाजीपुर सीट की थी। यहां से चुनाव लड़ रहे रामविलास पासवान लगातार पिछड़ रहे थे। दोपहर तक तस्वीर साफ हो गई। पासवान हार चुके थे।


उधर, छपरा से लालू प्रसाद यादव जीत गए थे। कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए सरकार बनाने की स्थिति में था, लेकिन रामविलास पासवान के सामने सबसे बड़ी चिंता हार नहीं, बल्कि दिल्ली के उस सरकारी बंगले की थी, जिसे उन्होंने लगभग दो दशक तक अपना घर बनाया था—12 जनपथ। यहीं से शुरू होती है दोस्ती और सत्ता के बीच एक ऐसे रिश्ते की कहानी, जिसमें एक बंगला बचाने के लिए राजनीतिक समीकरण बदले गए।


जब लालू बने दोस्त के सहारे

1990 में केंद्रीय मंत्री बनने के बाद रामविलास पासवान को दिल्ली का प्रतिष्ठित 12 जनपथ आवास मिला था। 2009 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद मंत्री पद भी गया और बंगला खाली करने की नौबत आ गई। ऐसे वक्त में उन्होंने अपने पुराने साथी लालू यादव का दरवाजा खटखटाया। लालू ने भी दोस्ती निभाई। राजनीतिक गणित बैठाया गया और राजद के समर्थन से रामविलास पासवान राज्यसभा पहुंच गए। राज्यसभा की सदस्यता मिली तो 12 जनपथ का बंगला भी बच गया।


हालांकि यह कहानी ज्यादा लंबी नहीं चली। 2020 में रामविलास पासवान के निधन के बाद बेटे चिराग पासवान ने बंगला बचाने की कोशिश की, लेकिन 2022 में उन्हें आखिरकार वह आवास खाली करना पड़ा। बंगले से रामविलास पासवान की कई निशानियां भी हटा दी गईं।


वक्त बदला... अब बारी लालू की थी

करीब 16 साल बाद राजनीति ने करवट बदली। बिहार में एनडीए की सरकार मजबूत बहुमत के साथ सत्ता में आई। इसी बीच राबड़ी देवी को नया सरकारी आवास—39 हार्डिंग रोड—आवंटित कर दिया गया। इसका सीधा मतलब था कि अब उन्हें वर्षों पुराने 10 सर्कुलर रोड वाले आवास से विदा लेना होगा। 10 सर्कुलर रोड केवल एक सरकारी बंगला नहीं था। यह राष्ट्रीय जनता दल की राजनीति का सबसे बड़ा पावर सेंटर माना जाता रहा है। यहीं से चुनावी रणनीतियां बनीं, नेताओं की बैठकें हुईं और कई बड़े राजनीतिक फैसले लिए गए। सूत्र बताते हैं कि जब नया आवास आवंटित होने की खबर आई तो लालू यादव के करीबी नेताओं ने सलाह दी कि वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात कर लें। लेकिन लालू ने साफ शब्दों में मना कर दिया। उन्होंने कहा, "अगर सरकार चाहती है तो बंगला खाली कर दूंगा। किसी से बात करने की जरूरत नहीं है।"


इस बंगले से जुड़ी हैं लालू परिवार की यादें

1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव का ठिकाना एक अणे मार्ग था। 2005 में सत्ता जाने के बाद राबड़ी देवी को पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर 10 सर्कुलर रोड का आवास मिला। 2017 में जब पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास देने की व्यवस्था खत्म हुई, तब राबड़ी देवी को विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते यही बंगला दोबारा आवंटित कर दिया गया। यही वह घर है, जहां से तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव की राजनीति शुरू हुई। विधायक बनने से लेकर मंत्री और उपमुख्यमंत्री बनने तक का सफर इसी पते से तय हुआ। परिवार की कई शादियां भी इसी परिसर में हुईं। इसलिए यह बंगला लालू परिवार के लिए सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं, बल्कि राजनीतिक और पारिवारिक यादों का प्रतीक बन गया।


5 देश रत्न मार्ग... सत्ता का सबसे चर्चित पता

अगर बिहार में किसी सरकारी बंगले की सबसे ज्यादा चर्चा हुई तो वह है 5 देश रत्न मार्ग। 2015 में महागठबंधन सरकार बनने के बाद यह बंगला डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को मिला। उनके स्वागत के लिए बंगले को करोड़ों रुपये खर्च कर पांच सितारा होटल जैसी सुविधाओं से सजाया गया। स्पेन से ग्रेनाइट और जयपुर से झूमर मंगाए गए। लेकिन यह बंगला तेजस्वी के लिए शुभ साबित नहीं हुआ। ढाई साल के भीतर सरकार गिर गई और उन्हें आवास खाली करने का नोटिस मिल गया।


तेजस्वी ने हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी, लेकिन हर जगह हार मिली। अंततः जुर्माना भरकर बंगला खाली करना पड़ा। बाद में यह आवास सुशील कुमार मोदी और तारकिशोर प्रसाद को मिला, लेकिन दोनों भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। 2024 में सम्राट चौधरी उपमुख्यमंत्री बने तो उन्होंने बंगले में वास्तु के अनुसार कई बदलाव कराए। एक दरवाजा स्थायी रूप से बंद कराया गया। अब फिर से उन्हें यही आवास मिला है और समर्थकों का दावा है कि बंगले के सारे "दोष" दूर कर दिए गए हैं।


6एम स्ट्रैंड रोड... जिसे नेता मानते हैं मनहूस

बिहार की राजनीति में एक और बंगला है, जिसकी चर्चा अक्सर अपशकुन के रूप में होती है—6एम स्ट्रैंड रोड। कहा जाता है कि पिछले डेढ़ दशक में जो भी नेता यहां रहा, उसका राजनीतिक करियर मुश्किलों में घिर गया। 2010 में यहां उत्पाद मंत्री अवधेश कुशवाहा रहे। बाद में रिश्वत लेते पकड़े गए और मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। 2015 में सहकारिता मंत्री आलोक मेहता यहां आए। डेढ़ साल बाद सरकार बदल गई और मंत्री पद चला गया। 2017 में मंजू वर्मा को यह बंगला मिला। कुछ समय बाद मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड में उनका नाम आया और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।


2020 में विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी पूरे उत्साह के साथ यहां पहुंचे। बंगले को लाखों रुपये खर्च कर नया रूप दिया और इसे पार्टी का प्रमुख राजनीतिक केंद्र बना दिया। लेकिन ढाई साल के भीतर उनकी पार्टी के विधायक भाजपा में चले गए। मंत्री पद भी गया और विधान परिषद की सदस्यता भी खत्म हो गई। राजनीति के शिखर पर पहुंचे सहनी जब इस बंगले से निकले तो लगभग शून्य पर पहुंच चुके थे।


इतना ही नहीं, पद जाने के बाद भी उन्होंने बंगला खाली नहीं किया। भवन निर्माण विभाग को कई नोटिस जारी करने पड़े, तब जाकर आवास खाली हुआ। इसके बाद सरकार ने किसी नेता की बजाय एक आईएएस अधिकारी को यह बंगला आवंटित किया, लेकिन वे भी ज्यादा समय तक वहां नहीं रह सके। पिछले कई महीनों से यह बंगला खाली पड़ा है और राजनीतिक गलियारों में आज भी इसे "मनहूस बंगला" कहकर याद किया जाता है।


राजनीति बदलती है, लेकिन बंगलों की कहानियां नहीं

बिहार की राजनीति में सरकारी बंगले सिर्फ रहने की जगह नहीं रहे। कभी दोस्ती बचाने का जरिया बने, कभी सत्ता बदलने का प्रतीक और कभी अंधविश्वास का केंद्र। 12 जनपथ, 10 सर्कुलर रोड, 5 देश रत्न मार्ग और 6एम स्ट्रैंड रोड—इन चार पतों ने नेताओं के उत्थान, पतन, दोस्ती, सत्ता और संघर्ष की ऐसी कहानियां देखी हैं, जो बिहार की राजनीति के इतिहास में लंबे समय तक याद रखी जाएंगी।