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29-Dec-2025 07:59 AM
By First Bihar
Bihar Politics : बिहार की राजनीति इन दिनों दो अलग–अलग वजहों से सुर्खियों में है। एक तरफ एक राजनीतिक परिवार अपने सरकारी बंगले को खाली करने को लेकर चर्चा में है, तो दूसरी ओर एक ऐसा राजनीतिक दल और उसका परिवार है, जो अपने करीबी और परिजनों को एक–एक कर सत्ता की शतरंज पर आगे बढ़ाने को लेकर लगातार खबरों में बना हुआ है। आज चर्चा उस दूसरी पार्टी और उसके मुखिया की, जिनकी राजनीतिक चालों को लेकर सत्ता के गलियारों में खासी हलचल है।
बताया जाता है कि इस पार्टी के मुखिया का राजनीतिक प्रोटोकॉल काफी मजबूत रहा है। बिहार की राजनीति से लेकर केंद्र तक का लंबा अनुभव उनके पास है। वर्तमान समय में भी वे केंद्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और शीर्ष केंद्रीय नेताओं से उनकी सीधी पहुंच मानी जाती है। यही वजह है कि उन्हें कई मामलों में राजनीतिक लाभ भी मिलता रहा है। कभी दूसरे दलों या नेताओं पर निर्भर रहने वाले यह नेता अब खुद को पूरी तरह आत्मनिर्भर मानते हैं। शायद इसी आत्मविश्वास के चलते उन्होंने तय कर लिया कि राजनीति से दूर रहने के बजाय अपने पूरे परिवार को ही राजनीति में “सेट” किया जाए।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इस रणनीति की शुरुआत उन्होंने अपनी पत्नी से की। पहले उन्हें विधानसभा का सदस्य बनाया गया। इसके बाद जब नीतीश कुमार कैबिनेट में जगह बनाने का अवसर आया, तो मुखिया ने ऐसी राजनीतिक चाल चली कि किसी को भी संभलने का मौका ही नहीं मिला। जिसे वह खुद की पार्टी और गठबंधन के भीतर एक बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं। लेकिन,पार्टी के अंदर अब इसी को लेकर विवाद भी सामने है। लेकिन इसकी चर्चा हम आगे करते हैं। पहले यह बताते हैं कि इन्होंने क्या किया ?
दरअसल, यह राजनीतिक चाल रही बेटे की राजनीति में लॉन्च करने का तरीका और यह भी कम दिलचस्प नहीं रहा। बिना किसी विधानसभा या विधान परिषद का चुनाव लड़े, बेटे को सीधे मंत्री बना दिया गया। इस फैसले ने राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। हालांकि नियमों के मुताबिक मंत्री बनने के बाद एक निश्चित समय के भीतर उन्हें विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी होता है। इस समस्या का समाधान भी पहले से ही निकाल लिया गया था। इस नेता ने केंद्र की पार्टी से बिहार विधान परिषद की एक सीट पहले ही “रिजर्व” करवा रखी है, ताकि जरूरत पड़ने पर बेटे को वहां से निर्वाचित कराया जा सके।
पत्नी और बेटे के बाद अब परिवार में सिर्फ बहू बचती हैं। हाल ही में यह खबर सामने आई कि मुखिया ने अपनी बहू को भी राजनीति में स्थापित करने की पूरी योजना बना ली है। बताया जा रहा है कि बहू को किसी आयोग का सदस्य बनाने के लिए केंद्र की पार्टी को बाकायदा पत्र भी भेजा गया है। यह खबर सामने आते ही मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बाद एनडीए के भीतर संभावित विवाद की बातें भी सामने आने लगी हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब पहले ही पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति है, तो फिर एक और पारिवारिक नियुक्ति से हालात और बिगड़ सकते हैं। दरअसल, जब बेटे को मंत्री बनाया गया था, उसी समय पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह शुरू हो गई थी। सूत्र बताते हैं कि पार्टी के चार विधायक इस फैसले से नाराज होकर दूसरे राजनीतिक खेमे से नजदीकियां बढ़ाने लगे हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व इन खबरों को सिरे से खारिज करता रहा है। मुखिया का कहना है कि विधायकों के साथ उनकी कोई नाराजगी नहीं है और सब कुछ सामान्य है।
लेकिन बहू को राजनीति में “सेट” किए जाने की खबर ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर इसलिए क्योंकि बहू न तो विधायक हैं और न ही विधान परिषद की सदस्य। ऐसे में आयोग की सदस्यता को लेकर उठ रहे सवालों को हल्के में लेना मुश्किल है।
इसी बीच मुखिया ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर पूरे मामले पर सफाई दी है। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि आज मीडिया में एक खबर देखने और पढ़ने को मिली। खबरें प्लांट करवाने और करने वालों को धन्यवाद, मजा आ गया। “वाह भाई वाह!” किसी बहाने खबर ने सुर्खियां तो बटोरी। उन्होंने आगे लिखा कि ऐसी “फालतू खबरें” भी मीडिया में चलती और बिकती हैं, यह आश्चर्य की बात है।
बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम बिहार की राजनीति में परिवारवाद बनाम योग्यता की बहस को एक बार फिर हवा दे रहा है। जहां एक ओर मुखिया अपनी राजनीतिक सूझबूझ और रणनीति के जरिए परिवार को मजबूत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर और गठबंधन में असंतोष की आहट भी साफ सुनाई दे रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह ‘राजनीतिक गोटी सेट’ की रणनीति पार्टी को मजबूती देती है या अंदरूनी विवाद को और गहरा कर देती है।