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19-Mar-2026 09:02 AM
By First Bihar
Bihar News : बिहार की ग्रामीण राजनीति इन दिनों उबाल पर है। 2026 में होने वाले पंचायत चुनाव से पहले पटना हाई कोर्ट में दायर एक याचिका ने राज्य की सियासी हलचल तेज कर दी है। इस याचिका में पंचायतों के पुराने ढांचे को चुनौती दी गई है और मांग की गई है कि नए परिसीमन के बिना चुनाव कराना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ अन्याय होगा। इस मुद्दे ने न सिर्फ सरकार बल्कि चुनाव आयोग की तैयारियों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल, बिहार में पंचायतों की सीमाएं 1991 की जनगणना के आधार पर 1994 में तय की गई थीं। यानी करीब 30 साल पुराने आंकड़ों पर आज भी पंचायत चुनाव कराए जा रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि तीन दशकों में राज्य की आबादी, भूगोल और सामाजिक संरचना में बड़े बदलाव आए हैं, लेकिन चुनावी ढांचा जस का तस बना हुआ है। ऐसे में वर्तमान व्यवस्था को “आउटडेटेड” बताते हुए इसे बदलने की मांग जोर पकड़ रही है।
इस याचिका को मुखिया संघ के प्रदेश अध्यक्ष मिथिलेश कुमार और अन्य जनप्रतिनिधियों का समर्थन मिला है। उनका तर्क है कि बिना नए परिसीमन के चुनाव कराना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे कई क्षेत्रों के मतदाताओं के अधिकार भी प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने अदालत से अपील की है कि जब तक पंचायतों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं हो जाता, तब तक चुनाव प्रक्रिया को रोका जाए।
मामले को और जटिल बनाता है बिहार में तेजी से हुआ शहरीकरण। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने 261 नए शहरी निकायों का गठन किया है, जिनमें नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत शामिल हैं। इस बदलाव के कारण कई पंचायतों का स्वरूप बदल गया है—कुछ क्षेत्र आधे शहर और आधे गांव में बंट गए हैं। इससे न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हुई है, बल्कि वार्डों का संतुलन और आरक्षण प्रणाली भी गड़बड़ा गई है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि सरकार ने शहरी क्षेत्रों का विस्तार तो कर दिया, लेकिन उससे प्रभावित ग्रामीण इलाकों की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं किया। इसका असर यह हुआ कि कई जगहों पर जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व असंतुलित हो गया है। यदि अदालत इस दलील को स्वीकार कर लेती है, तो पूरे राज्य में पंचायतों का नया नक्शा तैयार करना पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस कानूनी विवाद के कारण 2026 के पंचायत चुनाव टल सकते हैं। फिलहाल राज्य निर्वाचन आयोग नवंबर-दिसंबर 2026 में चुनाव कराने की तैयारी में जुटा है। लेकिन परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रिया में काफी समय लगता है, जिसमें जनसंख्या के आंकड़े, भौगोलिक बदलाव और आरक्षण व्यवस्था को ध्यान में रखना होता है।
अगर अदालत नए परिसीमन का आदेश देती है, तो चुनाव कार्यक्रम में देरी होना लगभग तय माना जा रहा है। इसके अलावा, नए परिसीमन से राजनीतिक समीकरण भी पूरी तरह बदल सकते हैं। कई मौजूदा जनप्रतिनिधियों की सीटें खत्म हो सकती हैं या उनके क्षेत्र बदल सकते हैं, जिससे सत्ता संतुलन पर बड़ा असर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, बिहार में पंचायत चुनाव से पहले यह मुद्दा एक बड़े राजनीतिक और कानूनी संघर्ष का रूप ले चुका है। अब सबकी नजरें पटना हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि 2026 का पंचायत चुनाव पुराने ढांचे पर होगा या नए सिरे से सीमाएं तय कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपडेट किया जाएगा।