पटना: बिहार में होने वाले पंचायत चुनाव अब नए परिसीमन (Delimitation) के आधार पर कराए जाएंगे। राज्य सरकार ने ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद क्षेत्रों के नए सिरे से परिसीमन कराने का फैसला किया है। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर पंचायत चुनाव, जनप्रतिनिधियों की संख्या, सरकारी खर्च और ग्रामीण विकास योजनाओं पर देखने को मिलेगा। परिसीमन के बाद राज्य में पंचायतों की संख्या मौजूदा 8041 से बढ़कर करीब 12,500 हो सकती है। इसके साथ ही मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्यों की संख्या में भी बड़ा इजाफा होगा। हालांकि, इस प्रक्रिया के कारण पंचायत चुनाव तय समय से देर से होने की संभावना भी जताई जा रही है। यदि चुनाव में देरी होती है तो केंद्र से मिलने वाली वित्त आयोग की अनुदान राशि भी प्रभावित हो सकती है।
2011 की जनगणना के आधार पर होगा नया परिसीमन
बिहार में पिछला पंचायत परिसीमन वर्ष 1993-94 में 1991 की जनगणना के आधार पर किया गया था। अब करीब तीन दशक बाद पहली बार 2011 की जनगणना के अनुसार पंचायतों की सीमाएं तय की जाएंगी। राज्य की करीब 8.28 करोड़ आबादी को आधार बनाकर ग्राम पंचायत, वार्ड, पंचायत समिति और जिला परिषद निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन होगा। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य बढ़ती आबादी के अनुसार संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, ताकि प्रत्येक पंचायत और वार्ड में जनसंख्या का अनुपात लगभग समान रहे।
पंचायतों की संख्या में होगा बड़ा बदलाव
फिलहाल बिहार में 8041 ग्राम पंचायतें हैं और इतनी ही संख्या में मुखिया तथा सरपंच के पद हैं। नए परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर लगभग 12,500 होने का अनुमान है। यानी करीब 55 प्रतिशत की वृद्धि होगी। इसी तरह 500 की आबादी पर एक वार्ड के मानक के अनुसार वार्डों की संख्या 1.09 लाख से बढ़कर लगभग 1.76 लाख तक पहुंच सकती है। पंचायत समिति सदस्यों की संख्या भी लगभग 11 हजार से बढ़कर 17,600 और जिला परिषद सदस्यों की संख्या 1160 से बढ़कर करीब 1760 होने की संभावना है। इस बदलाव के बाद पंचायत स्तर पर जनप्रतिनिधियों की संख्या में भारी इजाफा होगा, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व बढ़ेगा।
सरकार पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ
जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ने का सीधा असर सरकारी खर्च पर भी पड़ेगा। वर्तमान में पंचायत प्रतिनिधियों के मानदेय पर लगभग 330 करोड़ रुपए सालाना खर्च होता है। नए परिसीमन के बाद यह खर्च बढ़कर करीब 550 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष होने का अनुमान है। यह राशि राज्य वित्त आयोग से मिलने वाली अनुदान राशि के माध्यम से दी जाती है। ऐसे में सरकार को पंचायत प्रतिनिधियों के मानदेय के लिए अतिरिक्त बजट की व्यवस्था करनी होगी।
पंचायत भवन और कन्या विवाह मंडप की भी बढ़ेगी जरूरत
नई पंचायतों के गठन का असर केवल चुनावी व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण आधारभूत संरचना पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा। अभी राज्य में सभी पंचायतों के लिए पंचायत भवन उपलब्ध नहीं हैं। लगभग तीन हजार पंचायत भवन तैयार हैं, जबकि शेष निर्माणाधीन हैं। परिसीमन के बाद करीब 4500 नई पंचायतें बनने की स्थिति में उतने ही नए पंचायत भवनों का निर्माण करना पड़ेगा। एक पंचायत भवन के निर्माण पर लगभग दो से तीन करोड़ रुपए खर्च होते हैं। इसके अलावा प्रत्येक नई पंचायत में कन्या विवाह मंडप जैसी सुविधाओं का भी निर्माण कराना होगा। इन भवनों पर भी करोड़ों रुपए का अतिरिक्त व्यय आएगा।
पंचायत चुनाव में हो सकती है देरी
बिहार में पंचायत चुनाव इस वर्ष के अंत तक प्रस्तावित थे, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने, नए निर्वाचन क्षेत्र तय करने और आरक्षण रोस्टर लागू करने में समय लग सकता है। ऐसे में चुनाव निर्धारित समय से आगे बढ़ने की संभावना बनी हुई है। यदि चुनाव समय पर नहीं हो पाते हैं तो केंद्रीय वित्त आयोग से मिलने वाली अनुदान राशि में भी देरी हो सकती है। इससे पंचायत स्तर पर चल रही विकास योजनाओं पर असर पड़ सकता है और नई परियोजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है।
मंत्री ने क्या कहा?
पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार का उद्देश्य परिसीमन के बाद भी पंचायत चुनाव समय पर कराने का है। उनके अनुसार कैबिनेट ने परिसीमन का निर्णय लिया है और निर्वाचन आयोग इस प्रक्रिया पर काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि आरक्षण रोस्टर को भी नियमानुसार अपडेट किया जाएगा। आयोग यह तय करेगा कि पुराने क्षेत्रों को आंशिक रूप से बदला जाए या पूरी तरह नए सिरे से सीमांकन किया जाए। अंतिम निर्णय प्रक्रिया पूरी होने के बाद लिया जाएगा।
चुनाव में देरी हुई तो क्या होगा?
पंचायत चुनाव में देरी की स्थिति को लेकर लोगों के बीच कई तरह की चर्चाएं हैं। इस पर मंत्री ने स्पष्ट किया कि यदि चुनाव समय पर नहीं हो पाए तो संबंधित पदों पर प्रशासक की नियुक्ति की जाएगी और जनप्रतिनिधियों की समिति कार्य करती रहेगी। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में वर्तमान जनप्रतिनिधियों का मानदेय भी जारी रहेगा और पंचायतों का प्रशासनिक कार्य बाधित नहीं होगा।
पंचायत चुनाव क्यों रहते हैं सबसे अहम?
बिहार में पंचायत चुनाव केवल स्थानीय विकास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राज्य की राजनीति की मजबूत नींव भी माने जाते हैं। पंचायत प्रतिनिधि ही विधान परिषद के स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाने वाले सदस्यों के निर्वाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा पंचायतों के माध्यम से करोड़ों रुपए की विकास योजनाएं संचालित होती हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल पंचायत चुनाव को संगठन मजबूत करने और गांव स्तर तक अपनी पकड़ बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम मानते हैं।
इसी बीच राज्य सरकार ने ग्राम पंचायतों को होल्डिंग टैक्स और अन्य स्थानीय शुल्क वसूलने का अधिकार भी दे दिया है। ऐसे में आने वाले वर्षों में पंचायतों की आर्थिक और प्रशासनिक भूमिका पहले से कहीं अधिक मजबूत होने की संभावना है। नए परिसीमन के बाद बिहार की पंचायती व्यवस्था न केवल आकार में बड़ी होगी, बल्कि जिम्मेदारियों और संसाधनों के लिहाज से भी पूरी तरह नए स्वरूप में दिखाई देगी।