BIHAR NEWS : बिहार की सियासत में आज बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राज्य को नया मुख्यमंत्री मिलने वाला है और चाहे यह जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को मिले या किसी अन्य हो लेकिन सत्ता संभालते ही उन्हें जिन चुनौतियों का सामना करना होगा, उनमें सबसे बड़ी चुनौती राज्य की वित्तीय स्थिति है। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे पहले सरकारी खजाने को संभालने और आर्थिक दबाव को कम करने की जिम्मेदारी होगी।


इस समय बिहार की आर्थिक स्थिति को लेकर जो तस्वीर सामने आ रही है, वह चिंताजनक है। राज्य के कई जिलों से खबरें आ रही हैं कि लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनधारियों को समय पर वेतन और भुगतान नहीं मिल पा रहा है। अप्रैल का आधा महीना गुजर जाने के बावजूद करीब पांच लाख से अधिक कर्मचारियों को मार्च महीने का वेतन नहीं मिला है। यह केवल सामान्य देरी नहीं, बल्कि एक गहरे वित्तीय संकट का संकेत माना जा रहा है।


राज्य सरकार पर हर महीने वेतन और पेंशन के रूप में लगभग 9 से 10 हजार करोड़ रुपये का खर्च आता है। इतनी बड़ी राशि का नियमित प्रबंधन करना पहले से ही चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन मौजूदा हालात में यह और मुश्किल होता दिख रहा है। वेतन में देरी का असर कर्मचारियों के दैनिक जीवन पर साफ दिख रहा है। बैंक की ईएमआई, बच्चों की फीस और घरेलू खर्च प्रभावित हो रहे हैं, जिससे असंतोष भी बढ़ता जा रहा है।


यह समस्या किसी एक जिले या विभाग तक सीमित नहीं है। सहरसा, मधुबनी, बांका, गोपालगंज, सीतामढ़ी और पूर्वी चंपारण जैसे जिलों में बड़ी संख्या में कर्मचारी वेतन का इंतजार कर रहे हैं। सबसे अधिक असर शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग पर पड़ा है। बिहार में अकेले शिक्षा विभाग में लगभग 4 लाख शिक्षक और कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि अन्य विभागों को मिलाकर कुल सरकारी कर्मचारियों की संख्या 5 से 5.5 लाख के बीच है।


सिर्फ कर्मचारियों का वेतन ही नहीं, बल्कि ठेकेदारों का भुगतान भी लंबे समय से अटका हुआ है। सड़क, भवन, सिंचाई और ग्रामीण विकास से जुड़े ठेकेदारों को समय पर पैसा नहीं मिलने के कारण कई परियोजनाएं धीमी पड़ गई हैं। अनुमान है कि विभिन्न विभागों में ठेकेदारों का 12 से 15 हजार करोड़ रुपये तक का भुगतान लंबित है। कई जगहों पर निर्माण कार्य की गति कम हो गई है, तो कुछ स्थानों पर काम अस्थायी रूप से रुकने की स्थिति भी बन गई है। इसका सीधा असर राज्य के विकास कार्यों पर पड़ रहा है।


इस पूरी स्थिति के पीछे कई कारण हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण राज्य की सीमित आय है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में बिहार का कुल बजट करीब 2.78 लाख करोड़ रुपये है, लेकिन इसमें राज्य की अपनी आय केवल 60 से 65 हजार करोड़ रुपये के आसपास है। इसका मतलब यह है कि बिहार अपनी कुल आय का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार से मिलने वाले फंड और अनुदान पर निर्भर करता है। ऐसे में यदि केंद्र से मिलने वाली राशि में देरी होती है या अपेक्षा से कम फंड मिलता है, तो वित्तीय दबाव तुरंत बढ़ जाता है।


दूसरा बड़ा कारण बढ़ता सरकारी खर्च है। राज्य में सामाजिक कल्याण योजनाओं पर लगातार खर्च बढ़ रहा है। महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता, छात्रवृत्ति, पेंशन और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। केवल सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर ही राज्य सरकार का सालाना खर्च 35 से 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। ऐसे में यदि आय के स्रोत मजबूत नहीं होते, तो यह खर्च वित्तीय संतुलन को बिगाड़ सकता है।


इसके अलावा, बिहार पर बढ़ता कर्ज भी एक बड़ी चिंता है। राज्य पर कुल सार्वजनिक कर्ज 3.5 से 4 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुंच चुका है। हर साल सरकार को ब्याज और मूलधन चुकाने में ही 30 से 35 हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसका सीधा असर यह होता है कि बजट का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज को चुकाने में चला जाता है और नए विकास कार्यों के लिए सीमित संसाधन बचते हैं। कई बार सरकार को पुराने कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ता है, जिससे आर्थिक स्थिति और जटिल हो जाती है।


इन सभी संकेतों से साफ है कि बिहार की वित्तीय स्थिति सामान्य नहीं है। वेतन में देरी, ठेकेदारों का भुगतान अटकना और विकास कार्यों की धीमी रफ्तार इस संकट की गंभीरता को दिखाते हैं। ऐसे में नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी राज्य की आय बढ़ाना, निवेश को आकर्षित करना और खर्चों को प्राथमिकता के आधार पर नियंत्रित करना।


अगर समय रहते ठोस आर्थिक सुधार नहीं किए गए, तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है। इसलिए बिहार के नए नेतृत्व को वित्तीय अनुशासन, राजस्व वृद्धि और बेहतर प्रबंधन पर फोकस करना होगा, ताकि राज्य की विकास गति बनी रहे और कर्मचारियों तथा आम जनता पर इसका नकारात्मक असर न पड़े।