पटना: बिहार में आरक्षण के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। आरक्षण के भीतर आरक्षण यानी ‘कोटे में कोटा’ और क्रीमी लेयर के सवाल पर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख एवं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन के बीच जुबानी जंग अब खुलकर सामने आ गई है। मामला सिर्फ आरक्षण की समीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ सवर्ण समाज, गरीबों के अधिकार और सामाजिक न्याय की राजनीति भी जुड़ गई है।

चिराग बोले- सवर्णों की आशंकाएं दूर करना भी जिम्मेदारी

जहां केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान यह कह रहे है कि NDA सरकार सवर्ण जातियों की आशंकाओं को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है। वंचित वर्गों के हितों की रक्षा करते हुए यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी दूसरे सामाजिक समूह के साथ अन्याय या शोषण न हो।चिराग का कहना है कहा कि अगर ऊंची जातियों को लगता है कि उन्हें न्याय की आवश्यकता है, तो उनकी मदद करना भी वह अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। उन्होंने ऊंची जातियों के नेताओं पर यह आरोप भी लगाया कि वे अपने समुदाय की चिंताओं को प्रभावी तरीके से सामने नहीं रख पाए हैं।

अरुण भारती ने गिनाया रामविलास पासवान का ‘तीन वर्गों’ वाला इतिहास

वहीं, अब  चिराग पासवान के रुख को मजबूत करते हुए LJP (रामविलास) के सांसद अरुण भारती ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए पार्टी की विचारधारा को सामने रखा। उन्होंने लिखा कि उनकी पार्टी ‘जमात’ की बात करती है और सभी समाज की बात करती है।अरुण भारती ने स्वर्गीय रामविलास पासवान के राजनीतिक योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने तीनों वर्गों के न्याय की लड़ाई लड़ी थी। पोस्ट में उन्होंने क्रमवार दावा किया कि अगस्त 1990 में पिछड़े समाज के आरक्षण को लागू करवाने, अगस्त 2018 में दलित-आदिवासी सुरक्षा कानून की बहाली, सितंबर 2018 में सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए आरक्षण की मांग और जनवरी 2019 में सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू कराने में रामविलास पासवान की महत्वपूर्ण भूमिका रही।उन्होंने अपने पोस्ट के अंत में लिखा— “हमारी सीट आरक्षित है-हमारी सोच नहीं।” यही लाइन अब LJP (रामविलास) की व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राजनीति के संदेश के तौर पर देखी जा रही है।

संतोष सुमन का पलटवार-गरीब सवर्णों के लिए सबसे पहले जीतन राम मांझी ने पहल की

दूसरी ओर हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने चिराग खेमे के रुख पर पलटवार किया है। संतोष सुमन ने कहा कि आज कुछ लोग सवर्ण समाज के हितों की बात कर रहे हैं, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल करने वालों में जीतन राम मांझी सबसे आगे रहे। उन्होंने दावा किया कि फरवरी 2015 में बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए जीतन राम मांझी की कैबिनेट ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया था। हालांकि, कुछ ही समय बाद मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया और यह फैसला लागू नहीं हो सका।संतोष सुमन ने कहा कि बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का ऐतिहासिक निर्णय लिया और इसे देशभर में लागू किया।

‘गरीबी जाति देखकर नहीं आती’-HAM ने छेड़ा बड़ा सवाल

संतोष सुमन ने अपने बयान में आरक्षण की बहस को सिर्फ जाति तक सीमित रखने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि गरीब की तकलीफ जाति देखकर नहीं आती। गरीबी अगड़े-पिछड़े, दलित-सवर्ण या किसी अन्य सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं करती।उनका कहना है कि गरीबों के अधिकार और अवसर की लड़ाई भी किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं होनी चाहिए।इसी सोच के आधार पर HAM ने अपना नारा दोहराया है—“सबका इरादा नेक हो, भारत के गरीबों एक हो।”

‘कोटे में कोटा’ पर असली टकराव

NDA के दोनों घटक दलों के बीच सबसे बड़ा मतभेद ‘कोटे में कोटा’ के मुद्दे पर दिखाई दे रहा है। संतोष सुमन का कहना है कि दलित समाज के भीतर आरक्षण के लाभ की समीक्षा और ‘कोटे में कोटा’ पर चर्चा किसी का अधिकार छीनने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य यह देखना है कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे गरीब, वंचित और अंतिम पायदान पर खड़े परिवारों तक व्यापक रूप से पहुंच रहा है या नहीं।HAM का तर्क है कि यदि आरक्षण का लाभ लगातार कुछ सक्षम परिवारों तक ही सीमित रहता है, तो सबसे कमजोर तबकों को समान अवसर कैसे मिलेगा? पार्टी का कहना है कि इस विषय पर शांतिपूर्ण और सकारात्मक चर्चा होनी चाहिए। यहीं से NDA के भीतर वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आते दिख रहे हैं। एक तरफ आरक्षण व्यवस्था में किसी भी बदलाव को लेकर सामाजिक संवेदनशीलता का सवाल है, तो दूसरी तरफ उसके लाभ के समान वितरण की मांग उठ रही है।

सवर्णों की चिंता पर भी उठाए सवाल

संतोष सुमन ने चिराग खेमे पर अप्रत्यक्ष निशाना साधते हुए कहा कि जब सवर्ण समाज के एक वर्ग ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाने शुरू किए, तब अचानक सवर्ण समाज की चिंता और राजनीतिक समीकरणों की चर्चा तेज हो गई।उन्होंने सवाल किया कि गरीब सवर्णों की चिंता करना अच्छी बात है, लेकिन क्या गरीबों की चिंता राजनीतिक दबाव के बाद शुरू होनी चाहिए? HAM का कहना है कि उसकी राजनीति किसी एक जातीय समीकरण पर आधारित नहीं रही है। पार्टी खुद को हर जाति और हर वर्ग के गरीब की आवाज के रूप में पेश करती है।

MY, PDA से अलग ‘गरीब’ की राजनीति का दावा

संतोष सुमन ने बिहार और देश की राजनीति में लंबे समय से चले आ रहे जातीय और सामाजिक समीकरणों का जिक्र करते हुए कहा कि अलग-अलग राजनीतिक दलों ने अपने-अपने समीकरण बनाए हैं। किसी ने MY तो किसी ने PDA जैसे राजनीतिक समीकरणों के जरिए सामाजिक आधार तैयार किया।इसके विपरीत HAM का दावा है कि उसकी राजनीति किसी एक जाति के बजाय गरीब और वंचित व्यक्ति को केंद्र में रखती है।पार्टी का कहना है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ के सिद्धांत को मानती है और राजनीतिक दबाव के अनुसार अपना रुख बदलने की राजनीति नहीं करती।

रामविलास पासवान बनाम जीतन राम मांझी की विरासत का सवाल

इस पूरे विवाद में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि दोनों पक्ष अपने-अपने नेताओं की सामाजिक न्याय की विरासत को सामने रख रहे हैं। LJP (रामविलास) जहां रामविलास पासवान के जरिए पिछड़े, दलित और सामान्य वर्ग के गरीबों की राजनीति का दावा कर रही है, वहीं HAM जीतन राम मांझी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल को अपनी विचारधारा का प्रमाण बता रही है। यानी आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ नीति और कानून की बहस नहीं रह गया है। यह NDA के भीतर अलग-अलग सामाजिक समूहों को साधने और अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।

बिहार की सियासत में आगे क्या?

आरक्षण को लेकर चिराग पासवान और संतोष सुमन के बीच जारी बयानबाजी ने NDA के भीतर सामाजिक न्याय की राजनीति को नई बहस दे दी है। ‘कोटे में कोटा’, क्रीमी लेयर, गरीब सवर्ण और आरक्षण के लाभ के समान वितरण जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में और ज्यादा जोर पकड़ सकते हैं।

फिलहाल दोनों दल अपने-अपने तर्कों के साथ जनता के सामने हैं। चिराग पासवान जहां खुद को विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच पुल बनाने वाला नेता बता रहे हैं, वहीं संतोष सुमन आरक्षण के लाभ को अंतिम पायदान तक पहुंचाने और गरीबों को जातीय दायरे से बाहर देखने की वकालत कर रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या NDA के भीतर आरक्षण को लेकर यह मतभेद सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहेगा या आने वाले समय में यह बिहार की सियासत का बड़ा मुद्दा बन जाएगा?