Bihar MLC Election 2026 : बिहार विधान परिषद चुनाव में पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की लड़ाई अब सिर्फ उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं रह गई है। इस चुनाव में एक तरफ जेडीयू के मौजूदा विधान पार्षद और एनडीए उम्मीदवार नीरज कुमार हैं, तो दूसरी तरफ जन सुराज के उम्मीदवार अनुज कुमार सिंह को मोकामा के जेडीयू विधायक अनंत सिंह का खुला समर्थन चुनावी कहानी को अलग ही मोड़ दे चुका है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि सवाल यह भी है कि अनंत सिंह का असर कितना चला और नीरज कुमार का संगठन कितना भारी पड़ा? ऐसे में मतदान के दिन मोकामा से सामने आई तस्वीर ने इस पूरी कहानी में एक नया ट्विस्ट जोड़ दिया है।

वोट डालकर बाहर निकले कुछ स्नातक मतदाताओं से जब चुनावी माहौल को लेकर बात की गई तो उन्होंने साफ कहा कि वे किसी की बयानबाजी से प्रभावित नहीं हैं। उनका फैसला उम्मीदवार की योग्यता और उनकी पसंद के आधार पर है। यानी कैमरे के सामने मतदाता ने अपना पत्ता तो दिखाया, लेकिन यह नहीं बताया कि वोट आखिर किसके खाते में गया। यही तो इस चुनाव का सबसे बड़ा सस्पेंस है।

एक तरफ 'छोटे सरकार', दूसरी तरफ नीरज का संगठन

पटना स्नातक सीट पर इस बार चुनावी कहानी को समझने के लिए अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच चल रही सियासी खींचतान को समझना जरूरी है। मोकामा के चर्चित जेडीयू विधायक अनंत सिंह ने जन सुराज उम्मीदवार अनुज कुमार सिंह के समर्थन का ऐलान किया। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि अनंत सिंह खुद जेडीयू विधायक हैं और जिस सीट पर मुकाबला हो रहा है, वहां एनडीए की ओर से जेडीयू के मौजूदा एमएलसी नीरज कुमार मैदान में हैं।

यानी कहानी कुछ ऐसी बन गई है—पार्टी का उम्मीदवार एक तरफ और उसी पार्टी का चर्चित विधायक दूसरी तरफ से दूसरे प्रत्याशी के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है।राजनीति में इसे महज समर्थन कहना आसान है, लेकिन चुनावी मैदान में इसका असर कितना है, यही असली सवाल है। मोकामा की गलियों से लेकर पटना के राजनीतिक गलियारों तक यही चर्चा है कि क्या अनंत सिंह का प्रभाव स्नातक मतदाताओं को प्रभावित करेगा या फिर पढ़े-लिखे मतदाता अपने हिसाब से फैसला करेंगे?

मतदाता बोले- बयानबाजी से फर्क नहीं

मोकामा में मतदान के बाद मतदाताओं से जब अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच चल रही बयानबाजी को लेकर सवाल किया गया तो जवाब काफी दिलचस्प मिले। मतदाताओं ने कहा कि वे शिक्षित हैं और किसी नेता की बहसबाजी के आधार पर वोट नहीं कर रहे। एक पहली बार मतदान करने वाले मतदाता ने भी कहा कि उन्होंने योग्य उम्मीदवार को ध्यान में रखकर वोट किया है।यानी नेताओं के बीच चाहे जितनी तलवारें खिंची हों, मतदाता अपने फैसले को लेकर शांत दिखाई दिए।

यह तस्वीर चुनावी गणित के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता सामान्य चुनावी वोटर से अलग होता है। यहां उम्मीदवार की छवि, व्यक्तिगत संपर्क, मुद्दे और लंबे समय से बनाया गया संगठन—सबकी भूमिका मानी जाती है।यही वजह है कि मतदान केंद्र से निकलते वक्त मुस्कुराता हुआ मतदाता अपने साथ सबसे बड़ा राज लेकर जा रहा है—उसने वोट किसे दिया?

नीरज के सामने सिर्फ अनुज नहीं, अनंत फैक्टर भी

नीरज कुमार के लिए यह चुनाव इसलिए भी अहम है क्योंकि वह इस सीट से पहले भी जीत दर्ज कर चुके हैं और अब लगातार चौथी जीत की कोशिश में हैं।उनके सामने सीधे तौर पर जन सुराज के अनुज कुमार सिंह हैं, लेकिन चुनावी चर्चा में बार-बार एक तीसरा नाम भी आ रहा है—अनंत सिंह।अनंत सिंह के समर्थन ने अनुज कुमार की लड़ाई को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। खासकर मोकामा इलाके में इसका कितना असर पड़ा, यह 27 अक्टूबर को मतगणना के दौरान सामने आएगा। लेकिन दूसरी तरफ नीरज कुमार के पास अपना मजबूत राजनीतिक नेटवर्क और चुनावी अनुभव है। वह इस निर्वाचन क्षेत्र की चुनावी राजनीति से नए नहीं हैं। यही कारण है कि मुकाबले को किसी एक फैक्टर के भरोसे तय मानना जल्दबाजी होगी।

पटना-नालंदा-नवादा में बिछा है वोटों का जाल

पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सिर्फ मोकामा तक सीमित नहीं है। इसके दायरे में पटना, नालंदा और नवादा जिले आते हैं।तीनों जिलों में कुल 134 मतदान केंद्र बनाए गए हैं। इनमें 120 मूल और 14 सहायक मतदान केंद्र शामिल हैं।पटना में 80 मतदान केंद्र, नालंदा में 37 और नवादा में 17 केंद्र बनाए गए हैं। ऐसे में मोकामा के मतदाताओं की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन पूरे निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम सिर्फ मोकामा के मूड से तय नहीं होगा। यही वजह है कि राजनीतिक दल अब अलग-अलग इलाकों के वोटिंग पैटर्न का हिसाब लगाने में जुटे हैं।

फिल्म अभी बाकी है...

अगर इस चुनाव को किसी फिल्म की तरह देखें तो पहला हाफ खत्म हो चुका है।उम्मीदवारों ने प्रचार किया। समर्थन के ऐलान हुए। बयानबाजी हुई। आरोप-प्रत्यारोप हुए। फिर मतदान का दिन आया और मतदाता ने अपना फैसला ईवीएम पर नहीं, बल्कि बैलेट पेपर पर दर्ज कर दिया।अब असली क्लाइमेक्स बाकी है। जब 27 अक्टूबर को मतगणना होगी। तभी पता चलेगा कि मोकामा के मतदाताओं की चुप्पी के पीछे क्या राज था। क्या अनंत सिंह का समर्थन अनुज कुमार सिंह के लिए वोट में बदल पाया? क्या नीरज कुमार का संगठन और व्यक्तिगत पकड़ भारी पड़ी? या फिर शिक्षित मतदाताओं ने दोनों राजनीतिक ध्रुवों से अलग अपना फैसला सुनाया?

फिलहाल तस्वीर ऐसी है कि अनंत सिंह ने अपनी तरफ से दांव चल दिया है और नीरज कुमार चुनावी मैदान में मजबूती से डटे हैं।अब गेंद मतदाताओं के पाले से निकलकर मतगणना टेबल पर पहुंच चुकी है।कहानी के किरदार सामने हैं, दांव लग चुके हैं और पत्ते बंद हैं।अब 27 अक्टूबर को जब मतगणना का पर्दा उठेगा, तभी पता चलेगा कि पटना स्नातक सीट पर 'अनंत फैक्टर' चला या 'नीरज फैक्टर' भारी पड़ा।