पटना:  बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर होने वाला चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है, मुकाबला उतना ही दिलचस्प होता जा रहा है। शुरुआत में तस्वीर दो ध्रुवों के बीच सिमटी हुई दिखाई दे रही थी। एक तरफ एनडीए था तो दूसरी तरफ महागठबंधन। लेकिन अब मैदान में तीसरा कोण भी मजबूती से दिखाई देने लगा है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने कई सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया है। इसके साथ ही सबसे बड़ी परेशानी उन बागियों ने खड़ी कर दी है, जिन्होंने अपनी ही पार्टी या गठबंधन के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ ताल ठोक दी है।


यही वजह है कि आठ सीटों के इस चुनाव में सिर्फ पार्टियों की ताकत नहीं, बल्कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, बागियों का प्रभाव और वोटों का बिखराव भी नतीजे तय कर सकता है। कुल 164 उम्मीदवार मैदान में हैं और स्क्रूटनी के बाद 12 नामांकन रद्द हुए हैं। यानी चुनावी मैदान जितना बड़ा है, मुकाबले का गणित उतना ही उलझा हुआ है।


सबसे पहले नजर जाती है पटना स्नातक सीट पर। यहां मुकाबला सिर्फ एनडीए बनाम विपक्ष नहीं रह गया है। जेडीयू के मौजूदा विधान पार्षद नीरज कुमार के सामने अपने ही खेमे से चुनौती खड़ी हो गई है। मोकामा विधायक अनंत सिंह ने नीरज कुमार के बजाय जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन कर दिया है। यही वह मोड़ है, जिसने पटना स्नातक सीट को पूरे चुनाव की सबसे चर्चित सीटों में शामिल कर दिया है। नीरज कुमार एनडीए और जेडीयू के अधिकृत उम्मीदवार हैं और अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। वहीं अनुज सिंह के पक्ष में अनंत सिंह की सक्रियता मुकाबले को अलग रंग दे रही है। इस सीट पर कुल 22 प्रत्याशी मैदान में हैं। आरजेडी ने दिलीप कुमार और कांग्रेस ने डॉ. असदुल्लाह खान को उम्मीदवार बनाया है। यानी जिस चुनाव को कभी दो प्रमुख धड़ों के बीच मुकाबला माना जा रहा था, वहां अब चार मजबूत राजनीतिक कोण दिखाई दे रहे हैं। पटना की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दरअसल, इस सीट पर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह भी है कि बिखरते वोटों का फायदा आखिर किसे मिलेगा। अगर बागी और निर्दलीय उम्मीदवार कुछ हजार वोट भी अपनी ओर खींचते हैं तो मुख्य उम्मीदवारों के बीच जीत-हार का अंतर बदल सकता है।


इसके बाद तस्वीर और जटिल होती है दरभंगा स्नातक सीट पर। यहां सबसे ज्यादा 40 उम्मीदवार मैदान में हैं। बीजेपी के अधिकृत उम्मीदवार सर्वेश कुमार के सामने पार्टी से बागी होकर मैदान में उतरे आदित्य कुमार झा भी चुनौती पेश कर रहे हैं। दूसरी तरफ आरजेडी के अनिल झा, कांग्रेस के रजनीकांत पाठक, सीपीआई माले के संदीप चौधरी और जन सुराज के इम्तियाज नूरानी मुकाबले को और बहुकोणीय बना रहे हैं। यानी दरभंगा में लड़ाई सिर्फ उम्मीदवारों के बीच नहीं है। यहां हर अतिरिक्त उम्मीदवार किसी न किसी मुख्य प्रत्याशी के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है। यही वजह है कि बीजेपी इस बगावत को लेकर आश्वस्त दिखाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि आदित्य झा को समझा लिया जाएगा और वह मैदान से हट जाएंगे। बीजेपी प्रवक्ता पंकज सिंह ने दावा किया है कि एनडीए पूरी तरह एकजुट है।


अब चलते हैं तिरहुत स्नातक सीट की ओर। यहां 20 उम्मीदवार मैदान में हैं और मौजूदा विधान पार्षद बंशीधर ब्रजवासी एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। जेडीयू ने अभिषेक झा पर भरोसा जताया है, जबकि आरजेडी की ओर से डॉ. रश्मि विनायक गौतम और जन सुराज की तरफ से डॉ. विमोहन कुमार मैदान में हैं। यहां भी निर्दलीय और असंतुष्ट उम्मीदवार मुकाबले को आसान नहीं रहने दे रहे हैं। कोसी स्नातक सीट पर भी तस्वीर सीधी नहीं है। यहां 16 उम्मीदवार मैदान में हैं। बीजेपी ने मौजूदा विधान पार्षद एनके यादव को फिर मैदान में उतारा है। आरजेडी के नितेश कुमार, कांग्रेस के मनोज कुमार जायसवाल और जन सुराज के डॉ. रजनीश रंजन उनके सामने हैं। मौजूदा एमएलसी होने के बावजूद एनके यादव के लिए मुकाबला आसान नहीं माना जा रहा है।


अब अगर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की तरफ रुख करें तो वहां भी कहानी कुछ अलग नहीं है। पटना शिक्षक सीट पर 22 उम्मीदवार मैदान में हैं। भाजपा नेता नवल किशोर यादव लंबे समय से इस सीट पर मजबूत स्थिति में रहे हैं। इस बार आरजेडी ने पूर्व विधायक डॉ. संजीव कुमार को मैदान में उतारा है, जबकि जन सुराज की दिव्या ज्योति भी मुकाबले में हैं। इतने उम्मीदवार होने के कारण वोटों का बंटवारा यहां भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है। दरभंगा शिक्षक सीट पर कांग्रेस के डॉ. मदन मोहन झा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। वह खुद मौजूदा विधान पार्षद हैं और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। लेकिन इस बार आरजेडी ने उनके खिलाफ कुंवर राय को उतार दिया है। जेडीयू के घनश्याम राय और जन सुराज के एसपी राय भी मैदान में हैं। इसके अलावा सीपीआई (एम) के रामदेव राय उम्मीदवार हैं। यानी यहां महागठबंधन के भीतर ही मुकाबले की स्थिति बन गई है।


तिरहुत शिक्षक सीट की कहानी तो और भी दिलचस्प है। यहां 12 उम्मीदवार हैं। बीजेपी के नरेंद्र प्रसाद सिंह, सीपीआई के संजय कुमार सिंह और जन सुराज के श्याम नंदन यादव प्रमुख उम्मीदवारों में हैं। लेकिन असली ट्विस्ट कांग्रेस से जुड़ा है। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता राजेश राठौड़ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। कांग्रेस ने इस सीट पर कोई अधिकृत प्रत्याशी नहीं दिया है, फिर भी पार्टी से जुड़े एक बड़े चेहरे की मौजूदगी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है।


अब बचती है सारण शिक्षक सीट, जहां बगावत ने एनडीए के लिए खास चुनौती पैदा कर दी है। यहां जेडीयू के आनंद पुष्कर, आरजेडी के प्रो. जयराम यादव और जन सुराज के आफाक अहमद प्रमुख उम्मीदवार हैं। आफाक अहमद पिछली बार निर्दलीय जीतकर विधान पार्षद बने थे और इस बार जन सुराज के टिकट पर मैदान में हैं। वहीं आरएलएम प्रवक्ता रामपुकार सिन्हा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। इनके साथ कुशवाहा की पार्टी के चार में से तीन विधायक खड़े हैं और कुशवाहा की पार्टी एनडीए का हिस्सा है उसके बाद भी यह लोग यहाँ एनडीए कैंडिडेट की टेंशन बढ़ा रहे हैं।


सबसे दिलचस्प बात यह है कि सारण में उपेंद्र कुशवाहा जेडीयू उम्मीदवार आनंद पुष्कर के समर्थन में हैं, लेकिन आरएलएम के तीन विधायक निर्दलीय रामपुकार सिन्हा के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। यानी एक ही राजनीतिक खेमे में समर्थन का यह अंतर चुनावी समीकरण को उलझा सकता है।