BIHAR MLC : बिहार विधान परिषद की 10 सीटों (एक उपचुनाव सहित) के लिए होने वाले चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। सोमवार को नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि है और सभी प्रमुख दलों के उम्मीदवार बिहार विधानसभा परिसर पहुंचकर रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। इस चुनाव ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि कई बड़े और चर्चित चेहरे मैदान में उतर रहे हैं।


राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की प्रमुख सहयोगी पार्टियों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने पहले ही अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। भाजपा ने इस बार भोजपुरी फिल्म जगत के लोकप्रिय अभिनेता और गायक पवन सिंह को उम्मीदवार बनाकर चुनाव को बेहद चर्चित बना दिया है। उनके अलावा वर्तमान विधान पार्षद डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को भी पार्टी ने दोबारा मौका दिया है।


भाजपा ने उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है। पार्टी ने दो अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और दो सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट देकर विभिन्न वर्गों को साधने का प्रयास किया है।


वहीं जदयू ने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विधान परिषद से खाली हुए स्थान के लिए ललन प्रसाद को उम्मीदवार बनाया है। पार्टी ने स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार, भारती मंडल और शिवरानी देवी को भी मैदान में उतारा है। निशांत कुमार पटना, भारती मंडल मधुबनी और शिवरानी देवी पश्चिमी चंपारण क्षेत्र से आती हैं। जदयू की सूची में एक ओबीसी और तीन ईबीसी उम्मीदवारों को शामिल किया गया है, जिससे सामाजिक समीकरणों को संतुलित करने की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है।


इस बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने अशरफ अंसारी को उम्मीदवार घोषित किया है। अशरफ अंसारी की उम्मीदवारी को मुस्लिम समुदाय में पार्टी की राजनीतिक पहुंच बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।


हालांकि इस चुनाव में सबसे अधिक चर्चा भाजपा उम्मीदवार पवन सिंह को लेकर हो रही है। लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर सक्रिय राजनीति में उनकी वापसी ने राजनीतिक गलियारों का ध्यान आकर्षित किया है। नामांकन के दौरान भी उनकी मौजूदगी मीडिया और समर्थकों के बीच खास आकर्षण का केंद्र रहने की संभावना है।


दूसरी ओर महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने अब तक अपने उम्मीदवार के नाम का औपचारिक ऐलान नहीं किया है। पार्टी के भीतर पूर्व विधान पार्षद सुनील सिंह का नाम सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। वहीं कुछ दिनों से लालू प्रसाद यादव की पुत्री रोहिणी आचार्या के नाम की भी चर्चा चल रही है। यदि पार्टी रोहिणी को उम्मीदवार बनाती है तो विपक्ष परिवारवाद का मुद्दा उठाकर राजद पर हमला बोल सकता है।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधान परिषद चुनाव की संख्या बल की गणित विपक्ष के लिए आसान नहीं है। एक उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए लगभग 28 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। राजद के पास अपने दम पर पर्याप्त संख्या नहीं है, इसलिए उसे कांग्रेस, एआईएमआईएम और अन्य विपक्षी दलों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। मौजूदा समीकरणों को देखते हुए विपक्षी खेमे से केवल एक उम्मीदवार के जीतने की संभावना जताई जा रही है।


इधर एनडीए की सूची जारी होने के बाद राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा पर भी राजनीतिक नजरें टिक गई हैं। चर्चा है कि यदि उनके पुत्र और बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद नहीं भेजा जाता है तो भविष्य में उनके मंत्री पद को लेकर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।


राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे को अतिरिक्त उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारते हैं तो मुकाबला और रोचक हो सकता है। ऐसी स्थिति में दूसरी वरीयता के वोट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक जोड़-तोड़ की चर्चाएं भी तेज हो सकती हैं।


नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद यदि उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों से अधिक रहती है तो 18 जून को मतदान कराया जाएगा। फिलहाल पूरे बिहार की राजनीतिक निगाहें आज के नामांकन और राजद के अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं।