Bihar MLC Election 2026 : बिहार की राजनीति में भले ही विधानसभा चुनाव सबसे बड़ी लड़ाई मानी जाती हो, लेकिन इस बार विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाला चुनाव भी किसी बड़े राजनीतिक महासंग्राम से कम नहीं दिख रहा। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की इन सीटों पर सिर्फ उम्मीदवारों की किस्मत नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक पकड़, संगठन क्षमता और शिक्षित वर्ग में प्रभाव की भी परीक्षा होने वाली है। यही कारण है कि चुनावी अधिसूचना जारी होने से पहले ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।


हाल ही में विधान परिषद की 10 सीटों पर चुनाव हुए थे, लेकिन वहां मुकाबला देखने को नहीं मिला। जितने उम्मीदवार मैदान में थे, उतनी ही सीटें थीं और सभी निर्विरोध निर्वाचित होकर सदन पहुंच गए। मगर इस बार तस्वीर पूरी तरह अलग है। शिक्षक और स्नातक क्षेत्रों की आठ सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है, क्योंकि यहां मतदाता संख्या भले सीमित हो, लेकिन उनका राजनीतिक आकलन बेहद परिपक्व माना जाता है।


सबसे ज्यादा नजरें पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र पर टिकी हैं। यहां जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। पिछली बार उन्होंने राजद समर्थित उम्मीदवार को हराकर जीत दर्ज की थी। हालांकि इस बार समीकरण बदले हुए हैं। उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी आजाद गांधी अब भाजपा के साथ दिखाई दे रहे हैं। इससे जहां जदयू खेमे में आत्मविश्वास बढ़ा है, वहीं स्थानीय असंतोष और संभावित बागी उम्मीदवारों की चर्चा भी तेज है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सीट का परिणाम भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी की राजनीतिक रणनीति और प्रभाव का भी संकेत देगा।


तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी मुकाबला कम दिलचस्प नहीं है। करीब 1.35 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र को सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछली बार हुए उपचुनाव में जदयू को बड़ा झटका लगा था, जब शिक्षक नेता बंशीधर बृजवासी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी। अब जदयू के अभिषेक झा फिर से मैदान में सक्रिय हैं और जीत का दावा कर रहे हैं। लेकिन तिरहुत की राजनीतिक जमीन पर जीत का रास्ता आसान नहीं माना जा रहा।


उधर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भी चुनावी सरगर्मी लगातार बढ़ रही है। पटना शिक्षक क्षेत्र से नवल किशोर यादव शिक्षकों के बीच लगातार सक्रिय बने हुए हैं। वहीं तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में वामपंथी नेता संजय कुमार सिंह तीसरी बार चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। उनका दावा है कि शिक्षक हितों के लिए किए गए संघर्ष का लाभ उन्हें चुनाव में मिलेगा।


दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की लड़ाई भी इस बार चर्चा में है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मोहन झा एक बार फिर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने में जुट गए हैं। पिछली बार उन्होंने जदयू उम्मीदवार को हराकर जीत दर्ज की थी। ऐसे में इस सीट पर भी मुकाबला कांटे का माना जा रहा है।


सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। उपचुनाव में जीत हासिल करने वाले आफाक अहमद अपनी स्थिति मजबूत करने में लगे हैं। वहीं दिवंगत शिक्षक नेता केदार पांडे की राजनीतिक विरासत अभी भी क्षेत्र में प्रभावशाली मानी जाती है। उनके पुत्र आनंद पुष्कर के जदयू में शामिल होने के बाद इस सीट का चुनाव और अधिक रोचक हो गया है।


इन चुनावों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां जीत का गणित आम चुनावों से बिल्कुल अलग होता है। चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग 4.85 लाख मतदाता हैं, जबकि चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में करीब 45 हजार वोटर ही हैं। ऐसे में उम्मीदवारों के लिए जनसभाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्तिगत संपर्क, मतदाता सूची की तैयारी और समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की रणनीति होती है।


राजनीतिक जानकारों का कहना है कि शिक्षक और स्नातक मतदाता किसी राजनीतिक लहर या भावनात्मक मुद्दों से ज्यादा प्रभावित नहीं होते। वे उम्मीदवार की उपलब्धियों, संवाद क्षमता और अपने हितों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि इन सीटों पर जीत हासिल करना किसी भी दल के लिए प्रतिष्ठा का विषय माना जाता है।


विधान परिषद की मौजूदा स्थिति भी इस चुनाव को बेहद अहम बना रही है। 75 सदस्यीय सदन में एनडीए की स्थिति मजबूत है और भाजपा-जदयू गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। दूसरी तरफ राजद, कांग्रेस और वाम दलों के नेतृत्व वाला महागठबंधन अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हाल के उपचुनावों में विपक्ष को मिली कुछ सफलताओं ने उसके आत्मविश्वास को बढ़ाया है, जबकि कुछ सीटों पर सत्ता पक्ष को मिले झटकों ने उसे भी सतर्क कर दिया है।


एनडीए सभी आठ सीटों पर जीत का दावा कर रहा है, जबकि महागठबंधन का कहना है कि शिक्षकों और स्नातकों के बीच सरकार के प्रति नाराजगी का फायदा विपक्ष को मिलेगा। ऐसे में नवंबर तक चलने वाली यह चुनावी लड़ाई सिर्फ आठ सीटों का चुनाव नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि बिहार के शिक्षित वर्ग और शिक्षक समुदाय की नब्ज पर किस गठबंधन की पकड़ सबसे मजबूत है। यही वजह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में जुट गए हैं।