पटना : बिहार के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले मिड डे मील की गुणवत्ता को लेकर शिक्षा विभाग ने सख्त रुख अपना लिया है। स्कूलों में बच्चों को परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा। अब बच्चों की थाली तक खाना पहुंचने से पहले उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी सीधे प्रधानाध्यापक की होगी। प्रधानाध्यापक या प्रभारी प्रधानाध्यापक को खुद खाना चखना होगा और संतुष्ट होने के बाद ही बच्चों को भोजन परोसने की अनुमति मिलेगी।

शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) सीके अनिल के नेतृत्व में विभाग लगातार स्कूलों की व्यवस्था को दुरुस्त करने में जुटा है। इसी कड़ी में मध्याह्न भोजन योजना को लेकर जवाबदेही तय करने की दिशा में यह अहम कदम माना जा रहा है। विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल खाना स्कूल पहुंचा देना ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि बच्चों को मिलने वाला भोजन गुणवत्तापूर्ण और खाने योग्य होना भी जरूरी है।

पहले हेडमास्टर चखेंगे खाना, फिर बच्चों की थाली में पहुंचेगा भोजन

दरअसल, सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही थीं। शिकायतों में कहा जा रहा था कि केंद्रीयकृत रसोईघर और विद्यालय शिक्षा समितियों की ओर से कई जगह निर्धारित मानकों के अनुरूप भोजन उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।

इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए मध्याह्न भोजन योजना निदेशालय ने अब भोजन वितरण से पहले उसकी गुणवत्ता जांचने की व्यवस्था अनिवार्य कर दी है। इसके तहत प्रत्येक दिन बच्चों को भोजन परोसने से पहले प्रधानाध्यापक, प्रभारी प्रधानाध्यापक, प्रधान शिक्षक या प्रभारी प्रधान शिक्षक में से किसी एक को भोजन चखना होगा। यानी अब स्कूल में मिड डे मील की गाड़ी पहुंचने के बाद सीधे बच्चों को खाना नहीं परोसा जा सकेगा। पहले जिम्मेदार शिक्षक भोजन की जांच करेंगे और उसकी गुणवत्ता से संतुष्ट होने के बाद ही वितरण की अनुमति देंगे।

ACS सीके अनिल के नेतृत्व में जवाबदेही तय करने की पहल

शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव सीके अनिल के नेतृत्व में विभागीय स्तर पर स्कूलों की व्यवस्थाओं की समीक्षा और निगरानी पर जोर दिया जा रहा है। स्कूलों में पढ़ाई से लेकर शिक्षकों की उपस्थिति और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक जवाबदेही तय करने की कोशिश हो रही है।

मिड डे मील को लेकर जारी यह निर्देश भी इसी प्रशासनिक सख्ती के बीच महत्वपूर्ण है। इसका मकसद सिर्फ कागजी प्रक्रिया पूरी कराना नहीं, बल्कि बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता को लेकर स्कूल स्तर पर जिम्मेदारी सुनिश्चित करना है। विभाग ने राज्य के सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी किया है। अब हर दिन भोजन की गुणवत्ता जांचने और उसका रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था करनी होगी।

हेडमास्टर नहीं हैं तो नामित शिक्षक संभालेंगे जिम्मेदारी

शिक्षा विभाग ने इस व्यवस्था में किसी तरह की लापरवाही की गुंजाइश नहीं छोड़ी है। अगर प्रधानाध्यापक या प्रभारी प्रधानाध्यापक किसी कारण से विद्यालय में मौजूद नहीं हैं, तो उनके द्वारा नामित शिक्षक भोजन चखने की जिम्मेदारी निभा सकेंगे।भोजन चखने के बाद संबंधित शिक्षक को यह सुनिश्चित करना होगा कि खाना गुणवत्तापूर्ण है और बच्चों के खाने योग्य है। इसके बाद ही भोजन वितरण किया जाएगा।

सिर्फ खाना चखना नहीं, देना होगा लिखित प्रमाण-पत्र

इस नए निर्देश की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब भोजन की गुणवत्ता जांचने की जिम्मेदारी केवल मौखिक पुष्टि तक सीमित नहीं रहेगी। संबंधित प्रधानाध्यापक या नामित शिक्षक को लिखित प्रमाण-पत्र भी देना होगा। इस प्रमाण-पत्र में स्पष्ट रूप से दर्ज करना होगा कि उन्होंने स्वयं भोजन चखा है और उसकी गुणवत्ता संतोषजनक पाई है। प्रमाण-पत्र पर संबंधित जिम्मेदार शिक्षक के हस्ताक्षर भी अनिवार्य होंगे। इतना ही नहीं, इस प्रमाण-पत्र को विद्यालय के अभिलेख में सुरक्षित रखना होगा, ताकि जरूरत पड़ने पर इसकी जांच की जा सके।

बच्चों की सेहत से खिलवाड़ नहीं, अब स्कूलों पर भी रहेगी नजर

मिड डे मील योजना का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ स्कूलों में उनकी उपस्थिति और पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ाना भी है। ऐसे में भोजन की गुणवत्ता में किसी तरह की लापरवाही बच्चों की सेहत पर सीधा असर डाल सकती है।

शिक्षा विभाग के इस निर्देश से अब स्कूलों में मिड डे मील वितरण की प्रक्रिया में प्रधानाध्यापकों की जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। साथ ही भोजन की गुणवत्ता को लेकर शिकायत मिलने पर यह पता लगाना भी आसान होगा कि संबंधित दिन भोजन की जांच किसने की थी।

अब देखना होगा कि कागजों पर जारी यह सख्ती स्कूलों की रसोई और बच्चों की थाली तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंचती है। फिलहाल शिक्षा विभाग का संदेश साफ है—बच्चों को खराब या गुणवत्ताहीन खाना परोसने की लापरवाही अब नहीं चलेगी।