पटना: बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। शराबबंदी से राज्य को राजस्व का नुकसान होने संबंधी सवालों के बीच वित्त मंत्री और उपमुख्यमंत्री विजेंद्र यादव ने सरकार की नीति का जोरदार बचाव किया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर किसी कानून पर सवाल उठने लगे तो इसका मतलब यह नहीं कि कानून ही खत्म कर दिया जाए। उनके बयान ने शराबबंदी को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को और गर्म कर दिया है।
विजेंद्र यादव ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि आज बहुत सारे कानूनों पर आरोप लगते हैं। अगर हर कानून पर सवाल उठने के बाद उसे हटा दिया जाए तो फिर व्यवस्था कैसे चलेगी? उन्होंने तंज भरे अंदाज में कहा कि फिर तो जिसे जो मन करे, वह करे और जिसे जो मन में आए, वह खाए। लेकिन समाज में मर्यादा और सामाजिक समरसता भी कोई चीज होती है।
‘शराब कोई अच्छी चीज नहीं है’
शराबबंदी के सवाल पर विजेंद्र यादव ने कहा कि शराब कोई अच्छी चीज नहीं है। उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि गांधी जी भी शराब के विरोध में थे। उनका तर्क था कि किसी कानून का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उससे तत्काल कितना राजस्व मिल रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि लोगों की इच्छा के मुताबिक कानून बनना कोई नई व्यवस्था नहीं है। सरकारें समाज के व्यापक हित को ध्यान में रखकर कानून बनाती हैं। ऐसे में केवल यह कहना कि लोग शराब चाहते हैं या शराबबंदी से राजस्व का नुकसान हो रहा है, कानून को खत्म करने का आधार नहीं हो सकता।
लोक भवन मार्च पर पहले तंज, फिर संभली बात
शराबबंदी को लेकर विपक्ष की ओर से किए जा रहे विरोध पर भी विजेंद्र यादव ने तंज कसा। उन्होंने कहा कि जो शराब पीता है, वही इसका विरोध कर रहा है। हालांकि पत्रकारों ने तुरंत उन्हें स्पष्ट किया कि विपक्ष की ओर से प्रस्तावित लोक भवन मार्च शराबबंदी के खिलाफ नहीं, बल्कि सिवान में एक-47 से जुड़े विवाद को लेकर किया जा रहा है। सवाल स्पष्ट होते ही विजेंद्र यादव ने अपनी बात संभाली और कहा कि वह अलग विषय है और उस पर बातचीत चल रही है।यही पल बातचीत का सबसे दिलचस्प हिस्सा बन गया, जब शराबबंदी पर चल रही चर्चा अचानक सिवान के राजनीतिक विवाद की ओर मुड़ गई।
‘आप लोग ऐसी बातें मत कीजिए जिससे समाज में कुदृष्टि उत्पन्न हो’
वित्त मंत्री होने के नाते जब विजेंद्र यादव से सीधा सवाल किया गया कि क्या उन्हें लगता है कि शराबबंदी के कारण राज्य को राजस्व का नुकसान हुआ है, तो उन्होंने सवाल के जवाब में कानून और संविधान का हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि अगर इसी तरह हर कानून को राजस्व के चश्मे से देखा जाएगा तो फिर संविधान को मानना ही छोड़ देना चाहिए। उन्होंने तीखे अंदाज में कहा कि घर-घर में कानून बनाने की बात कैसे की जा सकती है।
विजेंद्र यादव ने पत्रकारों से यह भी अपील की कि ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, जिससे समाज में कुदृष्टि या असामाजिक स्थिति पैदा हो। उनका कहना था कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून हो सकते हैं। पड़ोसी राज्यों में शराबबंदी नहीं है, लेकिन गुजरात जैसे राज्य में शराबबंदी लागू है।
पड़ोसी राज्यों का उदाहरण देकर समझाया अंतर
विजेंद्र यादव ने कहा कि पूरे देश में कानून एक जैसे नहीं होते। अलग-अलग राज्यों की सामाजिक परिस्थितियों और नीतियों के आधार पर अलग-अलग कानून बनाए जा सकते हैं। इसलिए बिहार में शराबबंदी को लेकर केवल दूसरे राज्यों से तुलना करना उचित नहीं है।
उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि आखिर शराब पीना कोई अच्छी बात है क्या?
दरअसल, बिहार में शराबबंदी लंबे समय से राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा रही है। एक ओर सरकार इसे सामाजिक सुधार और परिवारों को शराब के नुकसान से बचाने की नीति के तौर पर पेश करती रही है, तो दूसरी ओर इसके आर्थिक प्रभाव, अवैध शराब के कारोबार और कानून के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
राजस्व बनाम सामाजिक सरोकार की बहस
शराबबंदी पर मौजूदा विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार को राजस्व का नुकसान और सामाजिक फायदे के बीच संतुलन कैसे तय करना चाहिए। शराब की बिक्री से मिलने वाला टैक्स राज्य सरकारों के लिए राजस्व का एक बड़ा स्रोत होता है, लेकिन बिहार सरकार का तर्क रहा है कि शराबबंदी का उद्देश्य केवल कमाई नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव है।
विजेंद्र यादव के ताजा बयान से साफ है कि सरकार फिलहाल शराबबंदी को राजस्व के पैमाने पर वापस लेने के मूड में नहीं दिख रही। उनका जोर इस बात पर है कि किसी कानून का उद्देश्य केवल सरकारी खजाना भरना नहीं, बल्कि समाज के हितों की रक्षा करना भी हो सकता है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि शराबबंदी से राजस्व नुकसान के मुद्दे पर विपक्ष आगे क्या रणनीति अपनाता है और सरकार आर्थिक नुकसान के सवालों का किस तरह जवाब देती है। फिलहाल विजेंद्र यादव के बयान ने यह साफ कर दिया है कि शराबबंदी पर सरकार अपने रुख से पीछे हटने के बजाय इसे सामाजिक मर्यादा और जनहित से जोड़कर बचाव करने की तैयारी में है।