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01-Mar-2026 01:32 PM
By First Bihar
Bihar Liquor Ban : बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर जब जेडीयू के सांसद देवेश चंद्र ठाकुर से एक इंटरव्यू में सवाल किया गया तो उन्होंने बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने साफ कहा कि वह शुरुआत से ही इस नीति के पक्ष में नहीं थे और यदि शराबबंदी हट जाए तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।
देवेश चंद्र ठाकुर ने कहा कि जब बिहार में वर्ष 2016 में शराबबंदी कानून लागू किया गया, तब उन्होंने इस पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि नीति की मंशा भले ही अच्छी हो, लेकिन इसे व्यवहारिक रूप से लागू करना बेहद कठिन है। उन्होंने माना कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सोच सकारात्मक थी। शराब के कारण परिवारों में कलह, मारपीट और आर्थिक बर्बादी जैसी समस्याएं सामने आती थीं। गरीब परिवारों में बच्चों की पढ़ाई का पैसा भी शराब में खर्च हो जाता था। इन सामाजिक समस्याओं को रोकने के उद्देश्य से यह कानून लाया गया।
हालांकि, ठाकुर का मानना है कि दुनिया में कहीं भी पूर्ण शराबबंदी पूरी तरह सफल नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि बिहार भौगोलिक रूप से कई राज्यों से घिरा हुआ है—उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से इसकी सीमाएं लगती हैं। ऐसे में तस्करी को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है। ट्रकों, निजी वाहनों और यहां तक कि रेलमार्ग के जरिए भी शराब की अवैध सप्लाई होती रहती है। उनका कहना था कि जब मांग बनी रहती है तो किसी न किसी तरीके से आपूर्ति भी हो ही जाती है।
उन्होंने यह भी कहा कि 2016 में कानून लागू होने के बाद से ही यह देखने को मिला कि प्रतिबंध के बावजूद शराब की उपलब्धता पूरी तरह खत्म नहीं हुई। इससे यह साबित होता है कि व्यवहारिक स्तर पर इस कानून को शत-प्रतिशत लागू करना कठिन है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि शराबबंदी हटा दी जाए तो यह ज्यादा व्यावहारिक निर्णय होगा।
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने उस समय का भी जिक्र किया जब शराबबंदी कानून पास होने के बाद दोनों सदनों—विधानसभा और विधान परिषद—में सदस्यों से शपथ दिलवाई गई थी कि वे शराब का सेवन नहीं करेंगे। ठाकुर ने बताया कि वह उस समय शपथ लेने के दौरान मौजूद नहीं थे। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने शपथ क्यों नहीं ली, तो उन्होंने कहा कि कानून तो पास हो ही चुका है, फिर अलग से शपथ लेने की क्या जरूरत है? उनका तर्क था कि यदि कानून बिहार के लिए है और शपथ इस बात की है कि बिहार में रहते हुए शराब का सेवन नहीं करेंगे, तो राज्य से बाहर जाने पर क्या स्थिति होगी? इसी आधार पर उन्होंने शपथ नहीं ली।
साथ ही, उन्होंने कैबिनेट विस्तार में हो रही देरी को लेकर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह नेतृत्व का निर्णय है। पार्टी और सरकार के शीर्ष नेता जो फैसला करेंगे, वह उसे स्वीकार करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह व्यक्तिगत राय रख सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय नेतृत्व का ही होता है और वह उसके साथ खड़े हैं।
देवेश चंद्र ठाकुर के इस बयान ने बिहार की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। शराबबंदी को लेकर पहले भी कई बार समीक्षा की मांग उठती रही है। अब जब सत्तारूढ़ दल के ही एक सांसद ने इसे अव्यावहारिक बताया है, तो यह मुद्दा आने वाले समय में और गर्मा सकता है।