पटना: बिहार के सरकारी स्कूलों में अगर कहीं शौचालय खराब है, कहीं पीने के पानी की व्यवस्था बदहाल है तो कहीं कक्षा की दीवारें मरम्मत की राह देख रही हैं, तो अब ऐसी समस्याओं के समाधान के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। स्कूलों की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य के 76 हजार से अधिक सरकारी विद्यालयों के लिए 372 करोड़ रुपये की कंपोजिट ग्रांट मंजूर की गई है। यानी अब स्कूलों की सूरत संवारने के लिए सीधे आर्थिक मदद मिलेगी।
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा उन विद्यालयों को मिलने वाला है, जहां छोटी-मोटी समस्याएं भी लंबे समय तक इसलिए बनी रहती थीं, क्योंकि मरम्मत के लिए कभी विभागीय अनुमति का इंतजार होता था तो कभी बजट का। अब स्कूलों को अपनी जरूरत के हिसाब से जरूरी काम कराने का मौका मिलेगा।
अब छोटी समस्या के लिए नहीं लगाने होंगे विभाग के चक्कर
अक्सर सरकारी स्कूलों में ऐसी समस्याएं देखने को मिलती हैं, जिनका समाधान बहुत बड़ी रकम से नहीं, बल्कि थोड़े से खर्च से हो सकता है। कहीं नल खराब होने से बच्चों को पानी की परेशानी होती है तो कहीं शौचालय की मरम्मत नहीं होने से विद्यार्थियों को दिक्कत उठानी पड़ती है। कई जगह कक्षा-कक्षों की रंगाई-पुताई और भवन के रखरखाव का काम भी अटका रहता है।
लेकिन अब इन समस्याओं को दूर करने के लिए शिक्षा विभाग के मुख्यालय से बार-बार अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 372 करोड़ रुपये की कंपोजिट ग्रांट से विद्यालयों को स्थानीय स्तर पर अपनी जरूरतों के अनुसार काम कराने में मदद मिलेगी।
कहीं पानी की समस्या दूर होगी तो कहीं चमकेंगी कक्षाएं
इस अनुदान का इस्तेमाल स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने में किया जाएगा। इसके तहत विद्यालय भवनों की छोटी-मोटी मरम्मत, कक्षा-कक्षों का रखरखाव, रंग-रोगन, पेयजल व्यवस्था और शौचालयों की मरम्मत जैसे काम कराए जा सकेंगे।
इसके अलावा बिजली व्यवस्था, साफ-सफाई, स्वच्छता और विद्यालय परिसर से जुड़ी दूसरी जरूरी जरूरतों पर भी राशि खर्च की जा सकेगी। शिक्षण गतिविधियों को सुचारु बनाए रखने के लिए आवश्यक आवर्ती खर्चों को पूरा करने में भी यह अनुदान उपयोगी होगा। यानी जिस स्कूल में जिस सुविधा की सबसे ज्यादा जरूरत होगी, वहां उसी काम को प्राथमिकता देने का रास्ता खुलेगा।
सेवा संकल्प और कायाकल्प अभियान से जुड़ी पहल
सरकार की यह पहल सेवा संकल्प एवं कायाकल्प अभियान के तहत की जा रही है। इसका मकसद केवल स्कूलों की इमारतों को बेहतर दिखाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को स्वच्छ, सुरक्षित और सुविधायुक्त शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना है।
अब तक कई विद्यालयों में मामूली मरम्मत के काम भी फाइलों और विभागीय प्रक्रियाओं में उलझे रहते थे। कंपोजिट ग्रांट मिलने से स्थानीय जरूरतों के अनुसार काम कराने में सहूलियत होगी। इससे विद्यालय प्रबंधन को समस्याओं के समाधान के लिए अधिक व्यावहारिक विकल्प मिलेंगे।
76 हजार स्कूलों को फायदा, बच्चों को मिलेगी राहत
बिहार के सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थियों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। स्कूलों में पेयजल, शौचालय, साफ-सफाई और बेहतर कक्षाएं जैसी सुविधाएं सीधे बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के अनुभव से जुड़ी हैं।अगर इस राशि का सही तरीके से इस्तेमाल हुआ तो स्कूलों में लंबे समय से लंबित छोटी-छोटी समस्याओं को दूर किया जा सकेगा। साथ ही शिक्षकों को भी बेहतर वातावरण में पढ़ाने का अवसर मिलेगा।
372 करोड़ रुपये की इस मंजूरी के बाद अब सबसे अहम सवाल इसके प्रभावी इस्तेमाल का है। क्योंकि सरकारी स्कूलों की असली तस्वीर सिर्फ बजट जारी होने से नहीं, बल्कि जमीन पर होने वाले काम से बदलेगी। अब देखना होगा कि यह आर्थिक मदद स्कूलों की बदहाल सुविधाओं को कितनी तेजी से दुरुस्त कर पाती है।