पटना: बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए शिक्षा विभाग ने बड़ा फैसला लिया है। अब सरकारी विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों (हेडमास्टर) को केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि उन्हें नियमित रूप से कक्षा में जाकर पढ़ाना भी होगा। विभाग के नए निर्देश के अनुसार प्रत्येक प्रधानाध्यापक को प्रतिदिन कम से कम दो पीरियड पढ़ाना अनिवार्य होगा। इस नए नियम के तहत हेडमास्टरों को रोजाना करीब एक घंटा 20 मिनट तक विद्यार्थियों को पढ़ाना होगा। इसके अलावा उन्हें स्कूल की सभी कक्षाओं का निरीक्षण कर यह सुनिश्चित करना होगा कि पढ़ाई सही तरीके से हो रही है या नहीं। शिक्षा विभाग का कहना है कि स्कूल का प्रमुख शिक्षक यदि खुद पढ़ाने में सक्रिय रहेगा तो विद्यालयों में शिक्षा का माहौल बेहतर होगा और शिक्षकों की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी।


हेडमास्टर अब नहीं रहेंगे सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी

सरकारी स्कूलों में अक्सर यह देखा जाता था कि प्रधानाध्यापक कार्यालयी कामों में अधिक व्यस्त रहते थे। सरकारी योजनाओं की निगरानी, रिपोर्ट तैयार करना, विभागीय पत्राचार और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों के कारण वे कक्षाओं में कम समय दे पाते थे। शिक्षा विभाग ने अब इस व्यवस्था में बदलाव किया है। नए निर्देश के अनुसार प्रधानाध्यापक विद्यालय के प्रमुख शिक्षक भी हैं, इसलिए उन्हें विद्यार्थियों के साथ सीधा जुड़ाव रखना होगा। विभाग ने स्पष्ट किया है कि स्कूल का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति की भूमिका केवल फाइलों और रिकॉर्ड तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में भी सक्रिय योगदान देना होगा।


शिक्षकों के बीच बांटे जाएंगे कार्यालयी काम

हेडमास्टरों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय मिल सके, इसके लिए प्रशासनिक कार्यों का बंटवारा दूसरे शिक्षकों के बीच किया जाएगा।विद्यालय के अन्य शिक्षक भी कार्यालयी जिम्मेदारियों में सहयोग करेंगे, जिससे प्रधानाध्यापक नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित रह सकेंगे। शिक्षा विभाग का मानना है कि स्कूल संचालन एक सामूहिक जिम्मेदारी है और सभी शिक्षकों के सहयोग से ही बेहतर शिक्षा व्यवस्था तैयार की जा सकती है।


हर दिन कक्षाओं का निरीक्षण करेंगे प्रधानाध्यापक

नए आदेश के तहत प्रधानाध्यापकों को रोजाना सभी कक्षाओं का निरीक्षण करना होगा। निरीक्षण के दौरान उन्हें कई बिंदुओं पर ध्यान देना होगा। प्रधानाध्यापक यह देखेंगे कि कौन शिक्षक किस विषय की पढ़ाई करा रहा है, बच्चों को विषय समझ में आ रहा है या नहीं और कक्षा में पढ़ाई का माहौल कैसा है। इसके साथ ही प्राथमिक कक्षाओं में फाउंडेशनल लिट्रेसी एंड न्यूमेरेसी (FLN) कार्यक्रम की निगरानी भी की जाएगी। स्कूलों में उपलब्ध FLN किट का सही उपयोग हो रहा है या नहीं, इसकी जिम्मेदारी भी प्रधानाध्यापक की होगी।


निरीक्षण व्यवस्था में भी बदलाव, अधिकारी पूछेंगे छात्रों से सवाल

शिक्षा विभाग ने स्कूल निरीक्षण प्रक्रिया को भी मजबूत करने का फैसला लिया है। अब निरीक्षण अधिकारी केवल रजिस्टर और दस्तावेजों की जांच नहीं करेंगे, बल्कि सीधे कक्षाओं में जाकर पढ़ाई की स्थिति का आकलन करेंगे।अधिकारी विद्यार्थियों से पाठ्यक्रम से जुड़े सवाल पूछकर यह पता लगाएंगे कि बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता कैसी है।इसके लिए निरीक्षण अधिकारियों को संबंधित विषयों की पुस्तकों का अध्ययन करने का निर्देश भी दिया गया है।


कॉलेज प्राचार्यों को भी जरूरत पड़ने पर पढ़ाना होगा

सरकारी स्कूलों के अलावा उच्च शिक्षा संस्थानों में भी शिक्षण व्यवस्था सुधारने की तैयारी की गई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों के अनुसार जिन कॉलेजों में शिक्षकों की कमी है, वहां प्राचार्यों को आवश्यकता पड़ने पर खुद कक्षाएं लेनी होंगी। अब कॉलेज प्राचार्य केवल प्रशासनिक कार्यों का हवाला देकर अध्यापन से दूर नहीं रह सकेंगे। शिक्षक की कमी होने पर उन्हें छात्रों को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।


सरकारी शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश

शिक्षा विभाग के इस फैसले का उद्देश्य सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है। विभाग चाहता है कि स्कूल और कॉलेज प्रमुख खुद शिक्षा व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाएं।विशेषज्ञों का मानना है कि जब संस्थान का नेतृत्व करने वाले अधिकारी पढ़ाई से जुड़े रहेंगे तो शिक्षकों की कार्यशैली में सुधार आएगा और छात्रों को बेहतर शैक्षणिक माहौल मिलेगा। अब देखने वाली बात होगी कि शिक्षा विभाग के इन नए निर्देशों को जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है। यदि इसका प्रभावी पालन हुआ तो बिहार के सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।