Bihar Government : बिहार में सरकार अब प्रशासन को गांव की चौपाल तक पहुंचाने की बड़ी तैयारी में जुट गई है। “सबका सम्मान, जीवन आसान” अभियान के तहत राज्य सरकार ने पंचायत स्तर पर सहयोग शिविर लगाने का फैसला किया है। इसे ग्रामीण बिहार में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और आम लोगों की समस्याओं का त्वरित समाधान सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार का दावा है कि अब लोगों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए ब्लॉक, थाना या जिला मुख्यालय के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, बल्कि अधिकारी खुद पंचायतों में पहुंचकर शिकायतों का समाधान करेंगे।
दरअसल, ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि सरकारी दफ्तरों में आम लोगों की सुनवाई समय पर नहीं होती। गरीब, किसान, बुजुर्ग, मजदूर और महिलाएं महीनों तक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए भटकती रहती हैं। कई बार मामूली काम भी फाइलों और प्रक्रिया की वजह से अटक जाते हैं। ऐसे माहौल में सरकार का यह अभियान प्रशासन और जनता के बीच सीधा संवाद कायम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार इस पहल को सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि “ग्रासरूट गवर्नेंस मॉडल” के तौर पर पेश कर रही है। इसका मकसद पंचायत स्तर पर ही लोगों को सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराना और शिकायतों का पारदर्शी तरीके से निपटारा करना है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक जवाबदेही भी बढ़ेगी और लोगों का भरोसा सरकार पर मजबूत होगा।
इस अभियान की तैयारियों को लेकर बुधवार को एक अहम समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में विभिन्न जिलों से आई शिकायतों और उनके निष्पादन की स्थिति पर विस्तार से चर्चा हुई। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि शिकायतों के समाधान में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार ने इस अभियान के संचालन और समन्वय की जिम्मेदारी सामान्य प्रशासन विभाग को सौंपी है, जबकि इसकी मॉनिटरिंग मुख्यमंत्री सचिवालय स्तर से की जाएगी।
राज्य सरकार ने तय किया है कि बिहार की सभी पंचायतों में हर महीने दो बार सहयोग शिविर लगाए जाएंगे। इसके लिए महीने के पहले मंगलवार और तीसरे मंगलवार का दिन निर्धारित किया गया है। इन शिविरों में पंचायत स्तर पर ही आवेदन लिए जाएंगे और जिन मामलों का समाधान मौके पर संभव होगा, उनका निपटारा तुरंत किया जाएगा।
सरकार ने जटिल मामलों के लिए भी समय सीमा तय की है। जिन शिकायतों में जांच या अतिरिक्त प्रक्रिया की जरूरत होगी, उन्हें अधिकतम 30 दिनों के भीतर निपटाने का लक्ष्य रखा गया है। माना जा रहा है कि समय सीमा तय होने से प्रशासनिक ढिलाई और लंबित फाइलों की समस्या पर काफी हद तक रोक लगेगी।
इस अभियान की सबसे खास बात यह है कि इसमें सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की भी भागीदारी अनिवार्य की गई है। जिला पदाधिकारी (डीएम), अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ), भूमि सुधार अधिकारी और पुलिस प्रशासन के अधिकारी भी शिविरों में मौजूद रहेंगे। इससे लोगों को यह भरोसा मिलेगा कि उनकी शिकायत सीधे जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंच रही है और उसका समाधान गंभीरता से किया जाएगा।
सरकार ने इस अभियान से कई विभागों को जोड़ा है। राजस्व एवं भूमि सुधार, गृह विभाग, ग्रामीण विकास, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बिजली और श्रम संसाधन विभाग सहित कई महकमों के अधिकारी इन शिविरों में मौजूद रहेंगे। यानी जमीन विवाद, पेंशन, राशन कार्ड, बिजली, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसी समस्याओं का समाधान एक ही मंच पर करने की तैयारी है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में सहयोग हेल्पलाइन 1100 और सहयोग पोर्टल का उद्घाटन भी किया है। सरकार का कहना है कि डिजिटल माध्यम से शिकायतों की निगरानी की जाएगी ताकि किसी स्तर पर भ्रष्टाचार या लापरवाही की गुंजाइश न रहे। ऑनलाइन मॉनिटरिंग से शिकायतों के निष्पादन की स्थिति पर भी नजर रखी जाएगी।
राजनीतिक जानकार इस पहल को प्रशासनिक के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी अहम मान रहे हैं। बिहार की राजनीति में गांव और पंचायतों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में सरकार गांव-गरीब और आम जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए इस अभियान को बड़े स्तर पर चला रही है। अगर यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो यह बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है और सरकार की छवि “जनता के बीच मौजूद सरकार” के रूप में मजबूत हो सकती है।