पटना : बिहार सरकार पर वित्तीय दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 में राज्य सरकार अब 72,901.31 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने जा रही है। जबकि मूल बजट में 61,939.48 करोड़ रुपये ऋण लेने का प्रावधान किया गया था। पहली तिमाही में ही ऋण राशि में यह बड़ा संशोधन सरकार की आर्थिक स्थिति और बढ़ते खर्च का संकेत माना जा रहा है।
सरकार को विकास योजनाओं, सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों और चुनावी घोषणाओं को पूरा करने के लिए भारी वित्तीय संसाधनों की जरूरत पड़ रही है। सीमित राजस्व स्रोतों के कारण राज्य सरकार को लगातार कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार शुरू में करीब एक लाख करोड़ रुपये तक ऋण लेने पर विचार कर रही थी, लेकिन राजकोषीय घाटा बढ़ने की आशंका को देखते हुए राशि को सीमित रखा गया।
बीते डेढ़ दशक में बिहार की कुल देनदारी तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2010 में राज्य पर कुल कर्ज 59,513 करोड़ रुपये था। यह आंकड़ा 2015 में बढ़कर 99,398 करोड़ रुपये हुआ। इसके बाद कर्ज में तेजी से वृद्धि जारी रही और 2020 तक यह 1.93 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। अब 2025 में बिहार पर कुल देनदारी 3.70 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है। वहीं 2026 के बजट अनुमान के अनुसार यह आंकड़ा 4.03 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कर्ज लेने की रफ्तार इसी तरह जारी रही तो आने वाले वर्षों में राज्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर दबाव पड़ सकता है। खासकर तब, जब सरकार की आय का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में खर्च होने लगे।
राजकोषीय घाटे की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में बिहार का राजकोषीय घाटा 4.5 प्रतिशत तक पहुंच गया था। वहीं 2025-26 में इसके 10 प्रतिशत की सीमा के करीब पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। केंद्र सरकार के वित्तीय नियमों के अनुसार राज्यों को अपनी जीएसडीपी के तीन प्रतिशत तक ही ऋण लेने की अनुमति है।
इसी बीच बिहार सरकार ने केंद्र से अधिक ऋण सीमा देने की मांग भी की थी। राज्य के वरिष्ठ मंत्री Bijendra Prasad Yadav ने केंद्रीय वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman से बिहार को जीएसडीपी के मुकाबले पांच प्रतिशत तक कर्ज लेने की अनुमति देने का आग्रह किया था। हालांकि केंद्र सरकार ने 16वें वित्त आयोग के लक्ष्यों का हवाला देते हुए इस मांग को स्वीकार नहीं किया। आयोग का उद्देश्य 2030-31 तक केंद्र और राज्यों के संयुक्त ऋण को नियंत्रित करना है।
बढ़ते कर्ज का असर अब राज्य की आय पर भी साफ दिखने लगा है। वर्तमान में बिहार की कुल राजस्व प्राप्ति का नौ प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है। इससे विकास योजनाओं और बुनियादी ढांचे पर खर्च करने की क्षमता प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर राज्य अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत नहीं करता है तो आने वाले समय में बिहार पर कर्ज का बोझ और तेजी से बढ़ सकता है। हालांकि सरकार शहरों के विस्तार, औद्योगिक निवेश और नए आर्थिक क्षेत्रों के विकास के जरिए आय बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।
वहीं आंकड़ों पर नजर डालें तो कई वर्षों में बिहार के बकाये ऋण की वृद्धि दर जीएसडीपी वृद्धि दर से अधिक रही है। खासकर कोरोना काल 2020-21 में ऋण वृद्धि दर 17.49 प्रतिशत रही, जबकि जीएसडीपी वृद्धि दर केवल 4.14 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इसे राज्य की वित्तीय सेहत के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है।
1. 2026-27 में कितना कर्ज लेगी सरकार?
- कुल प्रस्तावित ऋण: 72,901.31 करोड़ रुपये
- मूल बजट प्रावधान: 61,939.48 करोड़ रुपये
- पहली तिमाही में ही ऋण राशि बढ़ाई गई
2. कर्ज बढ़ने के प्रमुख कारण
- विकास योजनाओं पर बढ़ता खर्च
- चुनावी घोषणाओं का क्रियान्वयन
- सीमित राजस्व स्रोत
- सामाजिक कल्याण योजनाओं का दबाव
3. बिहार पर कुल देनदारी (करोड़ रुपये में)
| वर्ष | कुल कर्ज |
|---|---|
| 2010 | 59,513.5 |
| 2015 | 99,398.6 |
| 2020 | 1,93,534.3 |
| 2025 | 3,70,948.8 |
| 2026* | 4,03,866.8 |
*2026 का आंकड़ा बजट अनुमान पर आधारित
4. राजकोषीय घाटे की स्थिति
- 2024-25 में घाटा: 4.5%
- 2025-26 में घाटा: 10% सीमा के करीब
- केंद्र के नियम अनुसार राज्यों को जीएसडीपी के 3% तक ही ऋण लेने की अनुमति
5. केंद्र से क्या मांग की गई?
- Bijendra Prasad Yadav ने केंद्र से अधिक ऋण सीमा की मांग की
- Nirmala Sitharaman से जीएसडीपी के 5% तक कर्ज लेने की अनुमति मांगी गई
- केंद्र सरकार ने मांग अस्वीकार की
6. बढ़ते कर्ज का असर
- राज्य की आय का 9% से अधिक हिस्सा ब्याज भुगतान में जा रहा
- विकास योजनाओं पर दबाव बढ़ने की आशंका
- भविष्य में आर्थिक संकट का खतरा
7. ऋण बनाम जीएसडीपी वृद्धि दर
| वित्तीय वर्ष | ऋण वृद्धि दर | जीएसडीपी वृद्धि दर |
|---|---|---|
| 2017-18 | 13.02% | 11.33% |
| 2018-19 | 7.75% | 12.64% |
| 2019-20 | 14.48% | 12.51% |
| 2020-21 | 17.49% | 4.14% |
| 2021-22 | 13.34% | 9.18% |
| 2022-23 | 13.90% | 11.24% |
| 2023-24 | 13.44% | 13.71% |