BIHAR NEWS : बिहार में नई सरकार के गठन के बीच एक सरकारी नर्सिंग संस्थान का विवादित आदेश सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। मामला G.N.M. School SDH Hathua का है, जहां छात्राओं के लिए जारी एक निर्देश ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल, गोपालगंज जिले के हथुआ स्थित रामदुलारी कुँवर अनुमंडलीय अस्पताल परिसर में संचालित इस जीएनएम स्कूल की ओर से पत्रांक 64 के तहत एक सूचना जारी की गई है। इस आदेश में साफ तौर पर कहा गया है कि शैक्षणिक सत्र के दौरान कोई भी छात्रा विवाह नहीं कर सकती है। यदि कोई छात्रा इस अवधि में शादी करती है तो उसे इसकी जानकारी विभाग को देनी होगी और तत्काल प्रभाव से उसका नामांकन रद्द कर दिया जाएगा। इतना ही नहीं, आदेश में यह भी लिखा गया है कि इसके लिए छात्रा स्वयं जिम्मेदार होगी।
यह आदेश सामने आते ही शिक्षा व्यवस्था, महिला अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर बहस छिड़ गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या किसी सरकारी संस्थान को इस तरह छात्राओं के निजी जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार है? विवाह जैसे व्यक्तिगत निर्णय को शिक्षा से जोड़ना कितना उचित है, इस पर भी चर्चा तेज हो गई है।
इस संबंध में जब फर्स्ट बिहार की टीम ने अनुमंडलीय पदाधिकारी से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि वर्तमान में उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। हालांकि, उन्होंने आश्वासन दिया कि वे संबंधित विद्यालय के प्राचार्य से संपर्क कर इस निर्णय के कारणों की जानकारी प्राप्त करेंगे। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि मामले की जांच के उपरांत आवश्यकतानुसार उचित कार्रवाई की जाएगी।
कानूनी जानकारों का मानना है कि भारत के संविधान के तहत हर बालिग नागरिक को अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार है। ऐसे में किसी संस्थान द्वारा शादी करने पर पढ़ाई से वंचित करने की चेतावनी देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है। खासकर तब, जब यह नियम केवल छात्राओं पर लागू किया गया हो, तो यह लैंगिक भेदभाव का भी मामला बन सकता है।
वहीं, स्वास्थ्य विभाग के इस संस्थान की ओर से अभी तक इस आदेश को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। हालांकि कुछ लोगों का तर्क है कि नर्सिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्स में पढ़ाई और ट्रेनिंग का दबाव काफी अधिक होता है, ऐसे में संस्थान छात्रों का ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित रखना चाहता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके लिए शादी पर प्रतिबंध लगाना ही एकमात्र रास्ता है?
सोशल मीडिया पर भी इस फरमान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई यूजर्स इसे “तुगलकी फरमान” बता रहे हैं, तो कुछ लोग इसे महिलाओं की स्वतंत्रता पर सीधा हमला मान रहे हैं। वहीं कुछ लोग संस्थान के पक्ष में भी नजर आ रहे हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के आदेश न केवल महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं, बल्कि उन्हें शिक्षा से दूर करने का भी कारण बन सकते हैं। अगर कोई छात्रा शादी के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है, तो उसे रोकना गलत है।
अब देखना होगा कि यह मामला तूल पकड़ने के बाद बिहार सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या इस आदेश को वापस लिया जाएगा या फिर इसे लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे? फिलहाल, यह विवाद सरकारी संस्थानों की कार्यप्रणाली और छात्राओं के अधिकारों पर एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है।