Bihar News : बिहार में हर साल बाढ़ आती है। नदियां उफान पर होती हैं और पानी उतरने के बाद अपने पीछे छोड़ जाती हैं बालू और गाद की मोटी परत। अब तक कई जगहों पर यह जमाव परेशानी का कारण बनता रहा है, लेकिन अब सरकार इसी को कमाई का नया जरिया बनाने की तैयारी में है। बिहार में बाढ़ के बाद नदियों के किनारे जमा होने वाली बालू और गाद का वैज्ञानिक तरीके से सर्वे कराया जाएगा। इसके लिए ड्रोन, सैटेलाइट और आधुनिक तकनीक की मदद ली जाएगी। सर्वे पूरा होने के बाद सरकार इसकी नीलामी का रोडमैप तैयार करेगी।


इस पूरी योजना के तहत बिहार के 22 बाढ़ प्रभावित जिलों को शामिल किया गया है। खान एवं भूतत्व विभाग इन जिलों में नदियों के किनारे, दियारा क्षेत्रों और आसपास के इलाकों में जमा बालू और गाद का वास्तविक आकलन कराएगा। खास बात यह है कि इस बार सिर्फ अंदाजे के आधार पर यह तय नहीं होगा कि कहां कितनी बालू मौजूद है, बल्कि तकनीकी जांच के जरिए उसकी मात्रा, गुणवत्ता और जमाव की मोटाई तक का पता लगाया जाएगा।


सरकार की इस पहल के पीछे दो बड़े उद्देश्य हैं।  पहला, नदियों में जमा बालू और गाद का उपयोग कर सरकारी राजस्व बढ़ाना और दूसरा, ऐसी सामग्री को निर्माण कार्यों में इस्तेमाल करने की संभावनाएं तलाशना, जो फिलहाल बेकार पड़ी रहती है। अगर सर्वे के नतीजे अनुकूल रहे तो आने वाले समय में बालू और गाद की नीलामी से सरकार को अच्छी कमाई हो सकती है।


दरअसल, बिहार में सड़क, पुल, सरकारी भवन और दूसरी आधारभूत संरचनाओं का निर्माण लगातार हो रहा है। इन निर्माण कार्यों में बालू की बड़ी मात्रा में जरूरत पड़ती है। ऐसे में नदियों के किनारे प्राकृतिक रूप से जमा बालू की पहचान कर उसका नियमानुसार इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे एक तरफ निर्माण कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध होंगे तो दूसरी तरफ सरकार को राजस्व भी मिलेगा। हालांकि, इसके लिए पर्यावरण और नदी की प्राकृतिक संरचना से जुड़े नियमों का पालन करना जरूरी होगा।


इस योजना में सबसे दिलचस्प पहलू गाद को लेकर है। आमतौर पर बाढ़ का पानी उतरने के बाद खेतों, नदी किनारे और निचले इलाकों में गाद जमा हो जाती है। कई जगहों पर इससे जमीन और जल निकासी की समस्या भी पैदा होती है।अब खान एवं भूतत्व विभाग यह पता लगाएगा कि इस गाद का व्यावसायिक इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है। खासकर ईंट निर्माण के कारोबार में इसके उपयोग की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। अगर गाद की गुणवत्ता ईंट बनाने के अनुकूल पाई जाती है तो ईंट उद्योग से जुड़े कारोबारियों को कच्चा माल मिल सकता है। इससे गाद के इस्तेमाल का नया रास्ता खुलेगा। हालांकि, इसके लिए सबसे पहले मिट्टी की संरचना, चिकनाई, नमी और अन्य तकनीकी गुणों की जांच की जाएगी। हर जगह जमा गाद ईंट बनाने के योग्य नहीं होती, इसलिए वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर ही इसके उपयोग का फैसला होगा।


सर्वे को प्रभावी बनाने के लिए इस बार पारंपरिक तरीकों के बजाय आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जाएगा। नदी के किनारे और दियारा क्षेत्रों की ड्रोन से तस्वीरें ली जाएंगी।हाई रिजॉल्यूशन कैमरे, एरियल लिडार और फोटोग्रामेट्री तकनीक की मदद से इलाके का डिजिटल नक्शा तैयार होगा। इसके आधार पर 3D डिजिटल एलिवेशन मॉडल बनाया जाएगा। इससे यह समझना आसान होगा कि किस इलाके में बालू और गाद कितनी मात्रा में जमा है और उसकी परत कितनी मोटी है।


इसके अलावा सैटेलाइट तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया जाएगा।मानसून से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना कर यह पता लगाया जाएगा कि नदियों का विस्तार कहां बढ़ा है, कहां नए सैंड बार बने हैं और किन इलाकों में गाद का जमाव ज्यादा हुआ है। GIS यानी भौगोलिक सूचना प्रणाली के जरिए बाढ़ प्रभावित जिलों का डिजिटल बेस मैप तैयार किया जाएगा।इस काम में सिर्फ तकनीक ही नहीं, बल्कि विशेषज्ञों की टीम भी अहम भूमिका निभाएगी। सर्वे में भूगोल, भूविज्ञान और हाइड्रोलॉजी यानी जल विज्ञान के विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। पटना विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय, IIT पटना, NIT और केंद्रीय भूजल बोर्ड के विशेषज्ञों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ने की योजना है। स्थानीय लोगों और नदी के प्रवाह की जानकारी रखने वाले जानकारों से भी जरूरी सुझाव लिए जाएंगे।


दरअसल, किसी नदी में बालू और गाद का जमाव सिर्फ एक जगह की स्थिति पर निर्भर नहीं करता। नदी का बहाव, पानी की गति, जमीन की बनावट और मानसून के दौरान पानी का दबाव भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सर्वे में इन सभी पहलुओं को शामिल किया जाएगा। सर्वेक्षण एजेंसियां पूरी जानकारी जुटाकर विभाग को विस्तृत रिपोर्ट सौंपेंगी। खान एवं भूतत्व मंत्री प्रमोद कुमार ने बताया कि बिहार में नदियों के किनारे जमा बालू और अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद सिल्ट का सर्वे कराया जाएगा। इसमें बालू और गाद की मात्रा, गुणवत्ता और प्रकार की जानकारी जुटाई जाएगी। रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।


कुल मिलाकर, बिहार सरकार अब बाढ़ के बाद पैदा होने वाली एक बड़ी चुनौती को आर्थिक अवसर में बदलने की तैयारी कर रही है। हालांकि, इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वैज्ञानिक सर्वे में कितनी उपयोगी सामग्री मिलती है और उसका इस्तेमाल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना किस तरह किया जाता है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ तो आने वाले दिनों में बिहार की नदियों में जमा बालू और गाद सिर्फ बाढ़ की निशानी नहीं, बल्कि सरकारी खजाने और रोजगार के लिए कमाई का नया रास्ता भी बन सकती है।