Bihar Corruption : बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बीच काली कमाई को छिपाने का एक चौंकाने वाला तरीका सामने आया है। भ्रष्ट अधिकारियों ने जांच एजेंसियों की नजर से बचने के लिए अपनी अवैध कमाई से खरीदी गई जमीन, फ्लैट और गाड़ियों को अपने नाम रखने के बजाय पत्नी, माता-पिता, सास-ससुर, साले-साली, बच्चों और यहां तक कि प्रेमिकाओं के नाम कर दिया। अब यही चाल उनके लिए मुसीबत बनती दिख रही है।

ईओयू और निगरानी ब्यूरो की इस साल दर्ज करीब 40 एफआईआर की पड़ताल में सामने आया है कि लगभग 60 फीसदी मामलों में अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों या करीबी लोगों के नाम पर संपत्ति खड़ी की। जांच एजेंसियों ने भी अब इस तरीके को समझते हुए कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है। यानी भ्रष्ट अधिकारी के साथ-साथ अब उन लोगों से भी पूछताछ होगी, जिनके नाम पर कथित तौर पर काली कमाई से संपत्ति बनाई गई।

काली कमाई छिपाने का खेल, रिश्तेदार बने 'ढाल'

भ्रष्ट अधिकारियों को लगता था कि पत्नी, सास-ससुर, साले-साली या किसी करीबी के नाम पर जमीन और मकान खरीदने से जांच एजेंसियों को असली मालिक तक पहुंचने में मुश्किल होगी। लेकिन ईओयू और निगरानी की जांच ने इस रणनीति की परतें खोलनी शुरू कर दी हैं।

ईओयू के एडीजी अमित कुमार जैन के अनुसार, ऐसे मामलों में संबंधित रिश्तेदारों को भी आरोपी बनाया गया है। अब जांच एजेंसियां उन्हें तलब कर संपत्ति खरीदने के लिए इस्तेमाल किए गए पैसों के स्रोत का ब्योरा मांगेंगी। यानी जिस रिश्तेदार के नाम पर करोड़ों की संपत्ति है, उससे अब सवाल होगा—पैसा कहां से आया, जमीन किसने खरीदी और भुगतान किसने किया?

केस स्टडी-1: 9 साल के बेटे के नाम भी दो संपत्तियां

सहरसा के डीआरडीए निदेशक वैभव कुमार के ठिकानों पर ईओयू ने 31 मार्च को छापेमारी की थी। जांच में करीब 10 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति का पता चला। जांच में सामने आया कि वैभव कुमार ने मुजफ्फरपुर और पटना में कुल 16 संपत्तियां खरीदी थीं। हैरानी की बात यह रही कि इनमें उनके खुद के नाम पर सिर्फ एक संपत्ति थी। बाकी संपत्तियों में 6 उनके पिता ललित नारायण झा, 7 पत्नी नेहा नंदिनी और 2 महज 9 साल के बेटे ऐश्वर्य भास्कर के नाम दर्ज थीं। यानी कथित तौर पर काली कमाई को इस तरह परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम बांटा गया कि अधिकारी के नाम पर संपत्ति कम दिखाई दे।

केस स्टडी-2: गर्लफ्रेंड के लिए नेपाल में आलीशान मकान

नॉर्थ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड के सप्लाई डिवीजन के कार्यपालक अभियंता मनोज कुमार रजक के ठिकानों पर ईओयू ने 17 मार्च को छापेमारी की थी। जांच में करीब 3 करोड़ रुपये की जमीन-जायदाद के 17 कागजात और करीब 18 लाख रुपये की दो गाड़ियां मिलीं। जांच के दौरान पत्नी वीणाश्री के नाम पेट्रोल पंप और भाई संजय रजक के नाम एचपी गैस एजेंसी होने की जानकारी सामने आई। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात नेपाल से जुड़ी थी। आरोप है कि अधिकारी ने अपनी कथित गर्लफ्रेंड के रहने के लिए उसके ही नाम पर नेपाल के सुनसारी जिले के हरिपुर में आलीशान मकान खरीदा। अब जांच एजेंसी इस संपत्ति के लिए इस्तेमाल किए गए पैसों के स्रोत की भी पड़ताल कर रही है।

केस स्टडी-3: अधिकारी के नाम एक भी जमीन नहीं, प्रेमिका के नाम 7 प्लॉट

किशनगंज के तत्कालीन एसडीपीओ गौतम कुमार के खिलाफ हुई कार्रवाई ने भी जांच एजेंसियों को चौंकाया। ईओयू ने 28 मार्च को उनके ठिकाने पर छापेमारी की थी।जांच में करीब 80 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति का पता चलने का दावा किया गया। लेकिन कथित संपत्ति के बंटवारे का तरीका सबसे ज्यादा चर्चा में आया।गौतम कुमार ने अपने नाम पर एक भी जमीन नहीं खरीदी थी। पूर्णिया में खरीदे गए 16 प्लॉट में से 7 कथित तौर पर प्रेमिका, 4 पत्नी, 3 सास पूनम देवी और 1 बेटे सिद्धार्थ गौतम के नाम दर्ज था। इतना ही नहीं, सास और परिचित प्रकाश राय के नाम से एक-एक थार गाड़ी होने की जानकारी भी जांच में सामने आई।

आखिर रिश्तेदारों के नाम पर क्यों खरीदी जाती है संपत्ति?

जांच एजेंसियों के अनुसार, इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। अधिकारियों को लगता है कि सास, ससुर, साला, साली या महिला मित्र सीधे तौर पर अधिकारी पर आश्रित नहीं माने जाते। इसलिए उनकी संपत्ति का ब्योरा हर साल दिए जाने वाले अधिकारी के संपत्ति घोषणा पत्र में अनिवार्य रूप से शामिल नहीं हो सकता।

दूसरी वजह वित्तीय लेन-देन को अलग रखना है। जांच में अधिकारी के पैन, आधार और बैंक खातों पर शुरुआती फोकस रहता है। ऐसे में रिश्तेदारों के खातों और नाम का इस्तेमाल कथित तौर पर जांच की पहली कड़ी को कमजोर करने के लिए किया जाता है।इसके अलावा पकड़े जाने पर यह दलील भी दी जा सकती है कि संपत्ति ससुराल की पुश्तैनी जमीन, कृषि आय, पारिवारिक कारोबार या शादी में मिले उपहार से खरीदी गई है। महिलाओं के नाम पर संपत्ति खरीदने के पीछे स्टांप ड्यूटी में मिलने वाली रियायत और संपत्ति को 'स्त्रीधन' बताकर कानूनी कार्रवाई से बचाने की कोशिश भी एक वजह मानी जाती है।

अब बदलेगा खेल, रिश्तेदारों से भी होगा हिसाब

भ्रष्टाचार के इस कथित मॉडल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि जांच एजेंसियां अब सिर्फ अधिकारी की संपत्ति देखकर रुकने वाली नहीं हैं। जिन लोगों के नाम पर संपत्ति मिली है, उनसे भी पूछा जाएगा कि उनकी आमदनी कितनी थी और करोड़ों की संपत्ति खरीदने के लिए पैसा कहां से आया?यानी काली कमाई छिपाने के लिए जिस परिवार और करीबी लोगों को 'ढाल' बनाया गया था, अब वही लोग जांच की सबसे अहम कड़ी बन सकते हैं। भ्रष्टाचारियों का 'नाम किसी और का, पैसा किसी और का' वाला खेल अब जांच एजेंसियों की रडार पर है।