Bihar News : बिहार की राजनीति में विधानसभा चुनाव के नतीजों को लेकर एक बार फिर सियासी घमासान तेज हो गया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर महागठबंधन ने निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का दावा है कि कई विधानसभा सीटों पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने, मतदान के आंकड़ों में बदलाव और पोस्टल बैलेट की गिनती में कथित गड़बड़ियों ने चुनाव परिणामों को प्रभावित किया। इन आरोपों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उन 30 विधानसभा सीटों की हो रही है, जहां विजेताओं को मिले वोटों की संख्या में बेहद मामूली अंतर दर्ज किया गया।


उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 20 विधानसभा क्षेत्रों में जीतने वाले उम्मीदवारों को मिले वोटों की संख्या में शून्य से नौ तक का अंतर रहा। इसके अलावा 10 अन्य सीटों पर भी वोटों का अंतर 10 से 15 के बीच बताया गया है। इन सभी सीटों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। इनमें भाजपा, जदयू और लोजपा (रामविलास) के प्रत्याशी शामिल हैं। हालांकि, अलग-अलग सीटों पर विजेताओं को मिले वोटों की संख्या में समानता अपने आप में किसी चुनावी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है।


चुनाव परिणामों को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों के बीच राजद के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव भी SIR के मुद्दे पर मुखर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने इस प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग पर संदेह जताने वाले पुराने ऑडियो और वीडियो फिर से साझा किए हैं। महागठबंधन के नेताओं का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान जिन सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी था, वहां बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए। विपक्ष का मानना है कि इससे मतदान का सामान्य पैटर्न प्रभावित हो सकता है।


राजद के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने भी करीबी मुकाबले वाली सीटों पर मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं, कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असितनाथ तिवारी ने मतदान समाप्त होने के बाद जारी आंकड़ों में हुई कथित वृद्धि को 'फैटम वोट' यानी अस्तित्वहीन वोटों से जोड़कर सवाल उठाया है। उनका दावा है कि इन अतिरिक्त वोटों का असर कम अंतर से जीत-हार वाली सीटों पर पड़ सकता था। हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य सामने आने और उनकी स्वतंत्र पुष्टि का सवाल भी महत्वपूर्ण है।


रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, कुढ़नी और राजगीर विधानसभा क्षेत्रों में विजेताओं को 1,07,811 वोट मिले। यानी दोनों सीटों पर जीतने वाले उम्मीदवारों की कुल मत संख्या बिल्कुल समान रही। इसी तरह कुम्हरार में भाजपा के उम्मीदवार को 1,00,485 और इस्लामपुर में जदयू के उम्मीदवार को 1,00,487 वोट मिलने का उल्लेख है। दोनों के बीच महज दो वोटों का अंतर है। शाहपुर और बरौली में विजेताओं को क्रमशः 88,655 और 88,657 वोट मिले, जबकि छातापुर और बनमनखी में यह संख्या क्रमशः 1,22,491 और 1,22,494 बताई गई है।


तरारी और गोपालगंज में विजेताओं के वोटों की संख्या में पांच का अंतर दर्ज किया गया। रून्नीसैदपुर और फुलपरास में भी यही अंतर बताया गया है। पातेपुर और राजनगर में विजेताओं को मिले मतों का अंतर छह रहा। मुजफ्फरपुर और कुम्हरार में यह आठ तथा चेनारी और बांका में नौ वोट का अंतर बताया गया है। इन आंकड़ों ने चुनावी गणित को लेकर चर्चा जरूर बढ़ाई है, लेकिन केवल विजेताओं के कुल वोटों की तुलना से चुनाव में अनियमितता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।


विपक्ष ने पोस्टल बैलेट की गिनती को लेकर भी सवाल उठाए हैं। बाराचट्टी और इमामगंज जैसी सीटों का उदाहरण देते हुए दावा किया गया है कि पोस्टल बैलेट में उम्मीदवारों के बीच मतों का अंतर काफी कम था। महागठबंधन का आरोप है कि करीबी मुकाबलों में पोस्टल बैलेट के मतों में बदलाव से परिणाम प्रभावित हुए। हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए संबंधित सीटों के आधिकारिक मतगणना रिकॉर्ड और निर्वाचन आयोग के आंकड़ों की जांच जरूरी है।


रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरे चरण के मतदान के बाद कुल मतदान प्रतिशत में 0.18 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की गई थी। विपक्षी नेताओं ने इसी आधार पर लगभग 1,34,145 अतिरिक्त वोटों का हवाला देते हुए सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि इतनी संख्या में वोट जुड़ने से कम अंतर वाली सीटों पर परिणाम बदल सकते थे। दूसरी ओर, मतदान के अंतिम आंकड़ों में संशोधन या वृद्धि को अपने आप में फर्जी मतदान का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए वास्तविक मतदान और आधिकारिक आंकड़ों के बीच किसी प्रमाणित विसंगति को सामने लाना आवश्यक है।


फिलहाल SIR और चुनाव परिणामों को लेकर बिहार में राजनीतिक बहस तेज है। महागठबंधन निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया पर जवाब मांग रहा है, जबकि इन आरोपों की पुष्टि के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड और ठोस सबूत अहम होंगे। सवाल केवल इतना नहीं है कि किन सीटों पर वोटों की संख्या लगभग बराबर रही, बल्कि यह भी है कि क्या किसी नियम का उल्लंघन हुआ और क्या उससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुए। इसका स्पष्ट जवाब आरोपों से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और प्रमाणित तथ्यों 

से ही मिल सकता है।