पटना: बिहार में विकास कार्यों की रफ्तार पर अब भुगतान का संकट भारी पड़ता दिख रहा है। राज्य के विभिन्न विभागों और सरकारी एजेंसियों में ठेकेदारों के करीब 50 हजार करोड़ रुपये के बिल पिछले 9 से 10 महीनों से लंबित बताए जा रहे हैं। इस मुद्दे ने अब सिर्फ संवेदकों की परेशानी नहीं बढ़ाई है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि जब काम हो चुका है तो भुगतान आखिर क्यों नहीं हो रहा? क्या सरकारी मशीनरी में सुस्ती है, वित्तीय प्रबंधन की समस्या है या फिर फाइलें किसी दफ्तर में धूल फांक रही हैं?
बिहार संवेदक संघ का दावा है कि भुगतान नहीं मिलने से सबसे अधिक मार छोटे और मझोले ठेकेदारों पर पड़ रही है। संघ ने इस मामले में मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत से हस्तक्षेप की मांग की थी। इसके बाद ग्रामीण कार्य विभाग ने करीब 500 करोड़ रुपये का भुगतान जारी किया। लेकिन सवाल यही है कि अगर हस्तक्षेप के बाद 500 करोड़ रुपये जारी हो सकते हैं, तो बाकी हजारों करोड़ रुपये का भुगतान कब होगा?
छोटे ठेकेदार सबसे ज्यादा संकट में
राज्य में निर्माण कार्य करने वाले करीब 95 प्रतिशत ठेकेदार एमएसएमई (MSME) श्रेणी के छोटे और मध्यम वर्ग से आते हैं। इन ठेकेदारों ने बैंक से लोन लेकर, मशीनें खरीदकर और मजदूरों को भुगतान कर सरकारी परियोजनाओं को समय पर पूरा किया। लेकिन अब जब उनकी मेहनत की कमाई महीनों से अटकी हुई है तो उनकी आर्थिक हालत लगातार खराब होती जा रही है।
कई ठेकेदारों का कहना है कि बैंक की ईएमआई समय पर जमा नहीं हो पा रही है, जिससे उनका सिबिल स्कोर (CIBIL Score) खराब हो रहा है। इसका सीधा असर भविष्य में मिलने वाले बैंक लोन पर पड़ रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विकास कार्य करने वालों को ही आर्थिक संकट में धकेला जा रहा है?
किन विभागों में सबसे ज्यादा बकाया?
संवेदक संघ के अनुसार सबसे अधिक भुगतान कुछ प्रमुख विभागों में लंबित है।
भवन निर्माण विभाग – लगभग 3000 करोड़ रुपये
ग्रामीण कार्य विभाग – करीब 2100 करोड़ रुपये
पथ निर्माण विभाग – लगभग 1500 करोड़ रुपये
पीएचईडी – करीब 1500 करोड़ रुपये
लघु जल संसाधन विभाग – लगभग 1000 करोड़ रुपये
जल संसाधन विभाग – 500 करोड़ रुपये से अधिक
इसके अलावा बुडको, पुल निर्माण निगम, पर्यटन विकास निगम, बीएमएसआईसीएल, बीपीबीसीसी, बिजली कंपनियों और अन्य सरकारी एजेंसियों में भी बड़ी राशि अटकी होने की बात कही जा रही है।
सरकार के निर्देश, फिर भी भुगतान क्यों नहीं?
सरकार की ओर से विभागों को साफ निर्देश दिए गए हैं कि बकाया भुगतान नियमानुसार किया जाए। वित्त विभाग ने यह भी कहा है कि पीडी खाते में राशि पार्क न की जाए और बिना उचित कारण किसी भी बिल को लंबित न रखा जाए। जरूरत पड़ने पर सरकारी निगमों और कंपनियों को ऋण लेकर भी देनदारियों का निपटारा करने को कहा गया है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर भुगतान की प्रक्रिया बेहद धीमी बनी हुई है। यही कारण है कि ठेकेदारों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
क्या विकास कार्यों पर पड़ेगा असर?
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि यदि ठेकेदारों को समय पर भुगतान नहीं मिला तो क्या वे भविष्य की परियोजनाओं में रुचि दिखाएंगे? क्या मजदूरों का रोजगार प्रभावित होगा? क्या अधूरे प्रोजेक्ट और धीमी निर्माण गति आम लोगों की परेशानी बढ़ाएगी?
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकारी परियोजनाओं की सफलता सिर्फ टेंडर जारी करने से नहीं, बल्कि समय पर भुगतान सुनिश्चित करने से भी तय होती है। यदि भुगतान व्यवस्था कमजोर होगी तो विकास कार्यों की गुणवत्ता और गति दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
अब सबकी नजर सरकार पर
फिलहाल मुख्य सचिव के हस्तक्षेप के बाद 500 करोड़ रुपये का भुगतान जरूर हुआ है, लेकिन करीब 50 हजार करोड़ रुपये के लंबित भुगतान का मुद्दा अब भी जस का तस बना हुआ है। ठेकेदारों की मांग है कि सरकार विभागवार भुगतान की स्पष्ट समयसीमा घोषित करे, ताकि निर्माण कार्य बाधित न हों और छोटे संवेदकों को आर्थिक संकट से राहत मिल सके।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार जल्द सभी लंबित भुगतान जारी करेगी, या फिर हजारों ठेकेदार यूं ही अपनी मेहनत की कमाई का इंतजार करते रहेंगे? बिहार के विकास मॉडल की असली परीक्षा अब सड़कों और भवनों से ज्यादा भुगतान व्यवस्था पर होती दिखाई दे रही है।