पटना: बिहार में जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ की जगह ‘भूमिहार’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सरकार के लिए नई मुश्किल खड़ी करता दिख रहा है। विधानसभा में उठे सवाल, सरकार की ओर से दिए गए जवाब और अब RTI के जरिए सामने आई जानकारी ने पूरे मामले को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। बीजेपी विधायक जीवेश मिश्रा ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए सवाल किया है कि अगर संबंधित आयोग ने ऐसा कोई अनुरोध किया ही नहीं था, तो फिर सरकार ने किस आधार पर ‘भूमिहार ब्राह्मण’ की जगह सिर्फ ‘भूमिहार’ शब्द का इस्तेमाल शुरू किया?
दरअसल, बिहार विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान बीजेपी विधायक जीवेश मिश्रा ने ध्यानाकर्षण के माध्यम से यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने सवाल किया था कि राज्य सरकार की ओर से बनाए जाने वाले जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र में भूमिहार ब्राह्मण को ‘भूमिहार’ लिखा जा रहा है, जबकि राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के दस्तावेजों और कई पुराने रिकॉर्ड में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ दर्ज है। इससे आम लोगों के दस्तावेजों में असमानता और भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।
विधानसभा में सरकार ने क्या कहा था?
विधानसभा में इस सवाल का जवाब देते हुए उपमुख्यमंत्री विजेंद्र यादव की ओर से कहा गया था कि सवर्ण आयोग की तरफ से ‘भूमिहार ब्राह्मण’ की जगह ‘भूमिहार’ शब्द का इस्तेमाल करने का अनुरोध किया गया था। सरकार ने इसी अनुरोध के आधार पर यह व्यवस्था लागू किए जाने की बात कही थी। लेकिन अब RTI के जरिए सामने आया जवाब इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। RTI में संबंधित आयोग की ओर से स्पष्ट किया गया है कि उसकी तरफ से सरकार को ऐसा कोई अनुरोध या पत्र नहीं भेजा गया था, जिसमें ‘भूमिहार ब्राह्मण’ की जगह ‘भूमिहार’ शब्द इस्तेमाल करने की बात कही गई हो। यहीं से सवाल उठता है कि अगर आयोग ने ऐसा कोई पत्र लिखा ही नहीं था, तो विधानसभा में सरकार की ओर से यह जानकारी किस आधार पर दी गई?
जीवेश मिश्रा ने फिर खोला मोर्चा
बीजेपी विधायक जीवेश मिश्रा ने एक बार फिर इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने विधानसभा में किसी संशोधन का प्रस्ताव नहीं दिया था, बल्कि ध्यानाकर्षण के माध्यम से सरकार का ध्यान इस गंभीर विसंगति की ओर दिलाया था।
जीवेश मिश्रा का कहना है कि पुराने रिकॉर्ड में लगातार ‘भूमिहार ब्राह्मण’ शब्द का इस्तेमाल मिलता है। पुराने खतियान और अन्य राजस्व रिकॉर्ड में भी यही नाम दर्ज है। इसके अलावा 1951 के जिलों के गजट और 1931 की जनगणना के रिकॉर्ड में भी ‘भूमिहार ब्राह्मण’ का उल्लेख होने का दावा उन्होंने किया। ऐसे में उनका सवाल है कि जब पुराने सरकारी दस्तावेजों में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ दर्ज है, तो अचानक सरकारी प्रमाण पत्रों में सिर्फ ‘भूमिहार’ शब्द का इस्तेमाल किस आधार पर शुरू कर दिया गया?
एक ही सरकार के अलग-अलग विभागों में अलग-अलग नाम क्यों?
जीवेश मिश्रा ने सरकार के अलग-अलग विभागों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि एक तरफ निबंधन विभाग की ओर से जमीन की रजिस्ट्री से जुड़े दस्तावेजों में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ लिखा जा रहा है। वहीं राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के रिकॉर्ड में भी ‘भूमिहार ब्राह्मण’ का कॉलम मौजूद है। लेकिन दूसरी तरफ जाति प्रमाण पत्र में सिर्फ ‘भूमिहार’ लिखे जाने से लोगों के सामने एक अजीब स्थिति पैदा हो रही है।यानी सवाल सिर्फ एक शब्द का नहीं है, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड में एकरूपता का है। आखिर एक ही व्यक्ति के अलग-अलग सरकारी दस्तावेजों में उसकी जाति का नाम अलग-अलग क्यों दर्ज होगा?
‘सरकार को कटघरे में कौन खड़ा कर रहा है?’
RTI के जवाब के बाद जीवेश मिश्रा ने सरकार पर तीखा तंज भी कसा। उन्होंने कहा कि विधानसभा में उपमुख्यमंत्री ने जो जवाब दिया, वह अधिकारियों की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर था। लेकिन अगर अब RTI में यह स्पष्ट हो गया है कि आयोग ने ऐसा कोई पत्र भेजा ही नहीं था, तो फिर सवाल उठता है कि वह जानकारी सरकार तक पहुंचाने वाले अधिकारी पर क्या कार्रवाई हुई?जीवेश मिश्रा का तंज साफ था—जब सरकार की ओर से विधानसभा में दिया गया जवाब ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?उन्होंने कहा कि यह बेहद हास्यास्पद स्थिति है कि एक तरफ सरकार विधानसभा में आयोग के अनुरोध का हवाला देती है और दूसरी तरफ RTI में वही आयोग कहता है कि उसने ऐसा कोई अनुरोध किया ही नहीं।अब विपक्ष के पास सरकार से पूछने के लिए एक सीधा सवाल है—अगर आयोग ने पत्र नहीं लिखा तो ‘भूमिहार’ शब्द आया कहां से?
मुख्यमंत्री से कार्रवाई की मांग
जीवेश मिश्रा ने मुख्यमंत्री से इस पूरे मामले में संज्ञान लेने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस भ्रम को तत्काल खत्म करना चाहिए और स्पष्ट निर्देश जारी कर यह तय करना चाहिए कि सभी सरकारी दस्तावेजों में एक समान शब्दावली का इस्तेमाल हो।
उन्होंने यह भी मांग की कि यदि किसी अधिकारी ने बिना पर्याप्त तथ्य या प्रमाण के सरकार को ऐसी जानकारी दी, जिसके आधार पर विधानसभा में जवाब दिया गया और बाद में वही जवाब सवालों के घेरे में आ गया, तो जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
अब देखना दिलचस्प होगा कि RTI के इस जवाब के बाद सरकार इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देती है। क्योंकि मामला सिर्फ ‘भूमिहार’ बनाम ‘भूमिहार ब्राह्मण’ शब्द का नहीं रह गया है। मामला अब यह बन चुका है कि सरकार ने जो फैसला लिया, उसका आधार क्या था और विधानसभा में दिया गया जवाब आखिर किस रिकॉर्ड पर आधारित था? अगर सरकार के पास उस कथित पत्र या अनुरोध का कोई प्रमाण है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए। और अगर ऐसा कोई पत्र था ही नहीं, तो फिर जिम्मेदारी तय करना भी उतना ही जरूरी है। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है।