Bihar Assistant Professor Recruitment: बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर बड़ा बदलाव होने वाला है। लंबे समय से नियुक्ति प्रक्रिया, पात्रता, परीक्षा और इंटरव्यू के मानकों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब राजभवन ने इसकी व्यापक समीक्षा की पहल की है। राज्यपाल सह कुलाधिपति सय्यद अता हसनैन ने मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया की समीक्षा कर उसमें जरूरी सुधार सुझाने के लिए चार सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया है।
लोकभवन की ओर से शनिवार को समिति के गठन को लेकर अधिसूचना जारी कर दी गई। समिति को अपनी रिपोर्ट 90 दिनों के भीतर राज्यपाल को सौंपनी होगी। ऐसे में आने वाले महीनों में बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
छात्रों के आंदोलन के बाद बनी कमेटी
दरअसल, इस उच्चस्तरीय समिति का गठन अचानक नहीं हुआ है। यह फैसला 24 अगस्त को राज्यपाल और ऑल पीएचडी होल्डर्स एंड रिसर्च एसोसिएशन के बैनर तले अनशन कर रहे छात्रों के बीच हुए समझौते के तहत लिया गया है। छात्रों की ओर से सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार समेत कई मांगें उठाई जा रही थीं।
समझौते के बाद राजभवन ने नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कराने और उसमें सुधार के सुझाव लेने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अब इस जिम्मेदारी के लिए प्रशासन, शिक्षा और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े अनुभवी लोगों को समिति में शामिल किया गया है।
कमेटी में कौन-कौन शामिल?
चार सदस्यीय कमेटी में दो सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों के अलावा देश के जाने-माने शिक्षाविद और भौतिक विज्ञानी को शामिल किया गया है। समिति में संजय कुमार, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी; अमरजीत सिन्हा, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी; पद्मश्री प्रो. एचसी वर्मा, प्रमुख भौतिक विज्ञानी और आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर; तथा डॉ. पीके राय, जाने-माने शिक्षाविद शामिल हैं। राज्यपाल सचिवालय में अपर सचिव (विश्वविद्यालय) संजय कुमार समिति के सदस्य सचिव होंगे।
शिक्षा क्षेत्र का लंबा अनुभव
समिति में शामिल दोनों पूर्व आईएएस अधिकारियों को शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था का लंबा अनुभव है। अमरजीत सिन्हा बिहार और केंद्र सरकार में शिक्षा विभाग समेत कई महत्वपूर्ण विभागों के प्रधान रह चुके हैं। उन्होंने बिहार सरकार में अपर मुख्य सचिव के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली है।
वहीं संजय कुमार बिहार सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार में भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। वह केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय में सचिव के पद से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं। ऐसे में नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े प्रशासनिक और नीतिगत पहलुओं की समीक्षा में उनके अनुभव को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दूसरी ओर, प्रो. एचसी वर्मा देश के प्रमुख भौतिकविदों में शामिल हैं और आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर रह चुके हैं। उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है। समिति में डॉ. पीके राय को भी शिक्षाविद के तौर पर शामिल किया गया है।
नियुक्ति के किन नियमों की होगी समीक्षा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि समिति आखिर किन मुद्दों पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी। अधिसूचना के अनुसार, सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं की समीक्षा की जाएगी। इसमें सबसे पहले आयु सीमा को लेकर मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा होगी। इसके अलावा अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता और पात्रता से जुड़े नियम भी समिति के दायरे में होंगे। इसके साथ ही परीक्षा और साक्षात्कार की प्रक्रिया की भी समीक्षा की जाएगी। परीक्षा में अभ्यर्थियों के प्रदर्शन और इंटरव्यू के बीच किस तरह का संतुलन रखा जाए, इसे लेकर भी समिति सुझाव दे सकती है।
अलग-अलग मानकों के महत्व पर भी मंथन
नियुक्ति प्रक्रिया में अलग-अलग मानकों को दिए जाने वाले सापेक्षिक महत्व की भी समीक्षा की जाएगी। यानी किसी अभ्यर्थी की शैक्षणिक योग्यता, परीक्षा, शोध, अनुभव या साक्षात्कार को कितना महत्व दिया जाए, इस पर भी समिति विचार करेगी।
इसके अलावा अतिथि प्राध्यापकों से जुड़े मामलों को भी समीक्षा के दायरे में रखा गया है। विश्वविद्यालयों में लंबे समय से अतिथि प्राध्यापकों के तौर पर काम कर रहे शिक्षकों की स्थिति और नियुक्ति प्रक्रिया में उनके अनुभव अथवा अन्य पहलुओं को किस तरह देखा जाए, इस पर भी समिति सुझाव दे सकती है।
90 दिन बाद सामने आएगी तस्वीर
चार सदस्यीय कमेटी को अब मौजूदा व्यवस्था का अध्ययन कर अपनी सिफारिशें तैयार करनी हैं। इसके लिए समिति के पास 90 दिनों का समय होगा। रिपोर्ट सामने आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया में वास्तव में किस तरह के बदलाव किए जाएंगे।
अगर समिति की सिफारिशों को लागू किया जाता है तो इसका सीधा असर भविष्य में होने वाली सहायक प्राध्यापक नियुक्तियों में शामिल हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है। खासकर आयु सीमा, पात्रता, परीक्षा, इंटरव्यू और अतिथि प्राध्यापकों से जुड़े नियमों में बदलाव की स्थिति में आगामी भर्ती प्रक्रिया का स्वरूप भी बदल सकता है।
फिलहाल अभ्यर्थियों और शिक्षा जगत की नजरें इस उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। 90 दिनों के भीतर आने वाली रिपोर्ट यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है कि बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक बनने की राह आगे कितनी बदलेगी।