Bihar News : बिहार में रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में दूसरे राज्यों और विदेशों की ओर जाने वाले लोगों की संख्या लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। राज्य के करीब छह हजार ऐसे राजस्व गांव चिन्हित किए गए हैं, जहां से सबसे अधिक पलायन होता है। खासकर उत्तर बिहार के कई जिलों में रोजगार के सीमित अवसर, कम आमदनी, बाढ़ और कृषि पर निर्भरता लोगों को घर छोड़ने के लिए मजबूर कर रही है।
श्रम संसाधन विभाग के आंकड़ों और सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार बिहार के एक दर्जन से अधिक जिले ऐसे हैं, जहां से बड़े पैमाने पर पलायन दर्ज किया जाता है। इनमें दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, शिवहर, समस्तीपुर, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, गोपालगंज, सीवान, सारण, नवादा और गया प्रमुख हैं।
कम आमदनी वाले जिलों में ज्यादा पलायन
पलायन की समस्या का सीधा संबंध आर्थिक स्थिति से भी दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2011-12 के स्थिर मूल्य पर बिहार की प्रति व्यक्ति आय 38,265 रुपये थी। जिन जिलों से बड़े पैमाने पर पलायन होता है, उनमें से अधिकांश की प्रति व्यक्ति आय राज्य के औसत से नीचे है।
आंकड़ों में दरभंगा को प्रति व्यक्ति आय के मामले में राज्य में 10वें स्थान पर बताया गया है, जबकि मधुबनी 35वें, सीतामढ़ी 36वें, किशनगंज 37वें और शिवहर 38वें स्थान पर है। यानी इन इलाकों में स्थानीय स्तर पर आय के पर्याप्त साधन नहीं होने से लोगों के सामने बाहर जाकर काम करने का विकल्प ज्यादा मजबूत हो जाता है।
उद्योग कम, रोजगार के अवसर भी सीमित
बिहार में औद्योगिक गतिविधियों की कमी भी पलायन की बड़ी वजहों में शामिल है। वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार देश में 2,60,061 उद्योग पंजीकृत थे, जबकि बिहार में इनकी संख्या 3,386 थी।
औद्योगिक इकाइयों की सीमित संख्या का असर स्थानीय रोजगार पर पड़ता है। बड़ी संख्या में युवाओं को अपने जिले या राज्य में मनमाफिक नौकरी नहीं मिलती। ऐसे में दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब समेत दूसरे राज्यों के शहर उनके लिए रोजगार के प्रमुख केंद्र बन जाते हैं।
खेती से पर्याप्त कमाई नहीं
बिहार की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है। लेकिन छोटी जोत, सिंचाई और मौसम से जुड़ी समस्याएं किसानों और ग्रामीण परिवारों की आय को प्रभावित करती हैं। उत्तर बिहार के कई इलाकों में बाढ़ और लंबे समय तक जलजमाव खेती के साथ-साथ रोजमर्रा के रोजगार को भी प्रभावित करता है।
राज्य के 29 जिले बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में शामिल हैं। इनमें 15 जिलों को अति बाढ़ प्रवण बताया गया है। दूसरी ओर दक्षिण बिहार के कई हिस्सों में सूखे की स्थिति कृषि आधारित परिवारों के लिए चुनौती पैदा करती है।
मनरेगा में भी सीमित रोजगार
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए मनरेगा महत्वपूर्ण योजना है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इसके जरिए भी सभी परिवारों को पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पा रहा है। वर्ष 2024-25 में मनरेगा के तहत 175.1 लाख परिवारों के पास जॉब कार्ड था। इनमें रोजगार हासिल करने वाले परिवारों का हिस्सा 51.2 प्रतिशत रहा। वहीं 100 दिनों तक रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या करीब 0.4 लाख बताई गई।
युवाओं के लिए सिर्फ नौकरी नहीं, बेहतर भविष्य भी मुद्दा
पलायन का कारण केवल बेरोजगारी नहीं है। युवा उच्च शिक्षा, बेहतर करियर और ज्यादा आय के अवसरों की तलाश में भी बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में उच्च शिक्षा और विशेषज्ञ रोजगार के विकल्प सीमित होने के कारण यह प्रवृत्ति और मजबूत होती है।
बिहार सरकार ने राज्य में निवेश बढ़ाने और उद्योगों को विकसित करने पर जोर दिया है। सरकार ने नवंबर तक करीब 5 लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य रखा है। अगर नए निवेश से स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होते हैं तो आने वाले समय में पलायन की रफ्तार कम करने में मदद मिल सकती है।
साफ है कि बिहार में पलायन की समस्या के पीछे एक नहीं, बल्कि कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। रोजगार, उद्योग, कृषि आय, प्राकृतिक आपदा और शिक्षा—इन सभी मोर्चों पर स्थानीय स्तर पर अवसर बढ़ाना ही इस चुनौती का स्थायी समाधान बन सकता है।