Bhutkun Shukla Murder Case : वैशाली के चर्चित भुटकुन शुक्ला हत्याकांड में करीब 29 साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। मुजफ्फरपुर की अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-10 की अदालत ने इस सनसनीखेज हत्याकांड के मुख्य आरोपी दीपक कुमार सिंह को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने हत्या के साथ-साथ अवैध हथियार के इस्तेमाल के मामले में भी सजा सुनाई है। इस फैसले के बाद वर्षों से चले आ रहे इस चर्चित मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुई है।
बिहार के अपराध जगत में कभी खौफ का दूसरा नाम रहे भुटकुन शुक्ला की हत्या ने साल 1997 में पूरे उत्तर बिहार को हिलाकर रख दिया था। वैशाली जिले के खंजाहाचक गांव में हुई इस वारदात को बेहद सुनियोजित साजिश के तौर पर देखा गया था। नारायणी नदी के किनारे बसे इस गांव को भुटकुन शुक्ला का मजबूत गढ़ माना जाता था, जहां पहुंचना विरोधियों और पुलिस दोनों के लिए आसान नहीं था।
भुटकुन के ही सुरक्षा घेरे में शामिल था हत्यारा
पुलिस रिकॉर्ड और मामले की जांच के मुताबिक, यह हत्या अचानक हुई वारदात नहीं थी, बल्कि लंबे समय से रची जा रही साजिश का परिणाम थी। आरोप था कि विरोधी गुट ने दीपक कुमार सिंह को साल 1995 में भुटकुन शुक्ला के करीब पहुंचाया था। धीरे-धीरे दीपक ने भरोसा हासिल कर लिया और वह भुटकुन के सुरक्षा घेरे का अहम हिस्सा बन गया। करीब दो साल तक उसने भुटकुन का विश्वास जीता। उसे भुटकुन की दिनचर्या, आने-जाने के रास्तों और सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी हो गई थी। यही भरोसा बाद में सबसे बड़ा खतरा साबित हुआ।
जिस सुरक्षा पर था भरोसा, वही बनी मौत की वजह
खंजाहाचक गांव की भौगोलिक स्थिति भुटकुन शुक्ला के लिए सुरक्षा कवच मानी जाती थी। नारायणी नदी और आसपास के इलाकों की वजह से यहां से निकलने के कई गुप्त रास्ते थे। कहा जाता था कि खतरे की स्थिति में भुटकुन आसानी से इलाके से बाहर निकल सकता था। लेकिन दीपक कुमार सिंह इन रास्तों और ठिकानों से पूरी तरह परिचित हो चुका था। उसे पता था कि भुटकुन कब कहां रहता है और उसकी कमजोर कड़ी क्या है। इसी जानकारी का इस्तेमाल हत्या की साजिश को अंजाम देने में किया गया।
16 जुलाई 1997 की सुबह AK-47 की गोलियों से दहला था इलाका
16 जुलाई 1997 की सुबह भुटकुन शुक्ला अपने सामान्य दिनचर्या में व्यस्त था। बताया जाता है कि नदी में स्नान करने के बाद वह पूजा और अपने हथियारों की सफाई कर रहा था। इसी दौरान घात लगाए बैठे दीपक कुमार सिंह ने हमला कर दिया।आरोप के मुताबिक, दीपक ने AK-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। अचानक हुए इस हमले में भुटकुन शुक्ला को संभलने का मौका तक नहीं मिला और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। वारदात के बाद आरोपी फरार हो गया। इस घटना के बाद पूरे बिहार में अपराध जगत और राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई थी। मामले की जांच लंबे समय तक चली और कई कानूनी प्रक्रियाओं के बाद अब जाकर अदालत का फैसला आया है।
अदालत ने सुनाई दो मामलों में सजा
मुजफ्फरपुर कोर्ट ने लालगंज थाना कांड संख्या 100/1997 में फैसला सुनाते हुए दीपक कुमार सिंह को दोषी माना।
IPC की धारा 302 (हत्या): आजीवन कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माना।
आर्म्स एक्ट की धारा 27(1): अवैध हथियार के इस्तेमाल के मामले में 3 वर्ष का सश्रम कारावास और 5 हजार रुपये जुर्माना।
करीब तीन दशक पुराने इस हत्याकांड में आए फैसले को बिहार के चर्चित आपराधिक मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव माना जा रहा है। भुटकुन शुक्ला हत्याकांड ने 90 के दशक में बिहार के अपराध और सत्ता के गठजोड़ की कई कहानियों को सामने रखा था। अब 29 साल बाद अदालत के फैसले के साथ इस मामले में एक लंबी कानूनी लड़ाई का अंत हुआ है।