Bihar News : सरकारी खजाने से 98 लाख रुपये से ज्यादा की रकम निकल गई। फर्जी शिक्षिका की आईडी बनी, खाते में सेंध लगी और लाखों रुपये दूसरे खाते में ट्रांसफर हो गए। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात सिर्फ गबन की रकम नहीं, बल्कि वह चेतावनी है, जो कथित गड़बड़ी सामने आने से पहले ही विभाग के आला अधिकारियों को मिल चुकी थी। मार्च में कार्रवाई के निर्देश दिए गए, पत्र जारी हुआ, आपत्तियां दर्ज हुईं, लेकिन आरोप है कि जिला स्तर पर आदेशों को गंभीरता से लागू नहीं किया गया। सवाल है कि अगर समय रहते कार्रवाई हो जाती, तो क्या सरकारी खजाने को लगी यह चोट टाली जा सकती थी?
बिहार के भागलपुर शिक्षा विभाग में सामने आए 98 लाख 12 हजार 773 रुपये के कथित गबन ने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला फर्जी शिक्षक आईडी बनाकर सरकारी राशि के भुगतान से जुड़ा है। इस प्रकरण में उच्च वर्गीय लिपिक शिशिर कुमार झा और संविदा ऑपरेटर अविनाश राज की भूमिका जांच के दायरे में बताई गई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, अविनाश राज ने शिशिर झा की यूजर आईडी का इस्तेमाल कर फर्जी शिक्षिका का खाता जोड़ा और फिर लाखों रुपये फरीदाबाद स्थित खाते में ट्रांसफर कर दिए। हालांकि, पूरे मामले में किसकी क्या भूमिका थी, इसका अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा।
मार्च में मिली चेतावनी, फिर भी नहीं बदली व्यवस्था!
इस कहानी की शुरुआत 17 मार्च से होती है। शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव यानी ACS ने भागलपुर जिले का निरीक्षण किया था। इस दौरान शिक्षकों के वेतन भुगतान में देरी और मनमानी की शिकायतें सामने आईं। बताया जाता है कि इन शिकायतों पर उन्होंने नाराजगी जताई और लिपिक शिशिर झा तथा संविदा ऑपरेटर अविनाश राज का कार्य-पटल तत्काल बदलने का निर्देश दिया।
यानी विभाग के शीर्ष स्तर से यह संकेत मिल चुका था कि संबंधित व्यवस्था में सुधार और निगरानी की जरूरत है। इसके बावजूद आगे जो हुआ, उसने प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। जब वेतन भुगतान जैसे संवेदनशील काम में शिकायतें सामने आ रही थीं, तो फिर आदेश के पालन की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी? और अगर निर्देश का पालन नहीं हुआ, तो इसकी रिपोर्ट ऊपर तक क्यों नहीं पहुंची?
18 मार्च को पत्र निकला, कार्रवाई कहां अटकी?
17 मार्च की फटकार के अगले दिन, 18 मार्च को तत्कालीन क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक यानी RDDE की ओर से पत्र जारी किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें शिशिर झा से स्पष्टीकरण मांगने, उनका वेतन स्थगित करने और ऑपरेटर अविनाश राज को स्थापना शाखा के वेतन भुगतान वाले पटल से हटाकर दूसरे काम में लगाने का निर्देश दिया गया था।
अब सवाल उठता है कि जब लिखित आदेश मौजूद था, तो उसके पालन में ढिलाई क्यों हुई? रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शिशिर झा के मामले में कार्रवाई वेतन रोकने तक सीमित रही, जबकि अविनाश राज का कार्य-पटल नहीं बदला गया। यदि यह स्थिति सही है, तो यह केवल आदेश जारी करने और फाइल बढ़ाने का मामला नहीं, बल्कि आदेश को जमीन पर लागू कराने की व्यवस्था पर भी सवाल है।
जून तक उसी कुर्सी पर काम करता रहा ऑपरेटर
रिपोर्ट के अनुसार, 18 मार्च को आदेश जारी होने के बाद भी अविनाश राज स्थापना शाखा में वेतन संबंधी काम करता रहा। वह 9 जून को सेवामुक्त होने तक इसी व्यवस्था में बना रहा। इसी अवधि के दौरान कथित तौर पर लॉगिन आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल कर फर्जी भुगतान का खेल हुआ।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ऑपरेटर को संवेदनशील पटल से हटाने का निर्देश दिया गया था, तो फिर वह महीनों तक उसी काम में कैसे बना रहा? क्या आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने वाला कोई अधिकारी नहीं था? क्या किसी ने यह जांचने की कोशिश नहीं की कि निर्देश के बाद वास्तव में जिम्मेदारियां बदली गई हैं या नहीं?
इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है, क्योंकि सरकारी भुगतान प्रणाली में केवल पासवर्ड की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा और नियमित निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
चार साल से एक ही पटल पर जमे थे लिपिक?
मामले का दूसरा अहम पहलू शिशिर कुमार झा के कार्यकाल से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, वह करीब चार वर्षों से स्थापना शाखा के संवेदनशील वेतन भुगतान पटल पर कार्यरत थे। जबकि विभागीय नियमों के अनुसार, एक ही पटल पर अधिकतम तीन वर्ष के कार्यकाल के बाद बदलाव का प्रावधान बताया गया है।
यदि नियम के मुताबिक समय पर पटल बदल दिया जाता, तो क्या ऐसी कथित अनियमितता का जोखिम कम हो सकता था? इसका जवाब जांच में सामने आ सकता है। लेकिन चार साल तक संवेदनशील जिम्मेदारी एक ही कर्मचारी के पास बने रहने के दावे ने प्रशासनिक निगरानी को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि शिक्षक संगठनों ने प्रतिनियुक्ति और तबादले के नाम पर कथित अवैध वसूली के आरोप लगाए थे। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और उन पर हुई कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होना भी जरूरी है।
क्या सिर्फ कर्मचारी जिम्मेदार, या अफसरों की भी जवाबदेही?
98.12 लाख रुपये का कथित गबन सामने आने के बाद विभाग ने छह लिपिकों को हटाने की कार्रवाई भी की है। लेकिन असली सवाल इससे आगे का है। यदि मार्च में ही उच्चाधिकारियों ने चेतावनी दी थी और RDDE ने लिखित निर्देश जारी किया था, तो आदेश के पालन में हुई कथित चूक की जिम्मेदारी किसकी बनती है?
क्या किसी अधिकारी ने समय पर अनुपालन रिपोर्ट मांगी? क्या लॉगिन और भुगतान प्रक्रिया का ऑडिट हुआ? क्या संदिग्ध लेनदेन का पता लगाने के लिए निगरानी व्यवस्था सक्रिय थी? और क्या आदेशों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो रही है?
इन सवालों का जवाब सामने आए बिना पूरे मामले की तस्वीर अधूरी रहेगी। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि संबंधित अधिकारी गबन में शामिल थे। लेकिन आदेशों के पालन में कथित लापरवाही और निगरानी की विफलता की जांच जरूर होनी चाहिए।
क्योंकि सरकारी खजाने से निकला पैसा जनता की मेहनत की कमाई है। अगर चेतावनी के बावजूद व्यवस्था नहीं बदली और फिर लाखों रुपये का कथित गबन हो गया, तो जवाबदेही केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रह सकती, जिसने कंप्यूटर पर लॉगिन किया। यह भी पता लगाना होगा कि समय रहते खतरे को रोकने की जिम्मेदारी जिन के पास थी, उन्होंने अपना काम किया या नहीं।