पटना: बिहार की राजधानी पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को होने वाला उपचुनाव अब बेहद रोमांचक और दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की दमदार एंट्री ने पूरे चुनावी समीकरण को बदल दिया है। करीब तीन सप्ताह के विदेश दौरे से लौटते ही तेजस्वी यादव ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की उम्मीदवार रेखा गुप्ता के समर्थन में लगातार दो दिनों तक मेगा रोड शो करने जा रहे हैं, जिससे राजधानी की सियासत गरमा गई है।
तेजस्वी के इस शक्ति प्रदर्शन से जहां राजद के पारंपरिक वोट बैंक में नई ऊर्जा आने की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) की रणनीति पर असर पड़ सकता है। अब मुकाबला भाजपा, राजद और जन सुराज के बीच त्रिकोणीय होता दिखाई दे रहा है, लेकिन विपक्षी वोटों के संभावित बिखराव से भारतीय जनता पार्टी को सबसे अधिक लाभ मिलने की चर्चा तेज हो गई है।
तेजस्वी की एंट्री से बदला चुनावी नैरेटिव
चुनाव प्रचार के शुरुआती चरण में यह माना जा रहा था कि बांकीपुर में भाजपा और जन सुराज के बीच सीधी टक्कर बन सकती है। प्रशांत किशोर लगातार क्षेत्र में सक्रिय थे और खुद को भाजपा के विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन विदेश से लौटते ही तेजस्वी यादव ने प्रचार की कमान संभाल ली और लगातार दो दिनों तक रोड शो कर यह संदेश देने की कोशिश करेंगे कि राजद इस सीट पर पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ रही है।
तेजस्वी के रोड शो में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौजूदगी ने चुनावी माहौल को पूरी तरह बदल सकता है। इसके बाद अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र यह बन गया है कि भाजपा के खिलाफ मुख्य चुनौती आखिर किसकी होगी—राजद की या जन सुराज की।
बांकीपुर का सामाजिक समीकरण क्यों है खास?
पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट को लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। इस सीट पर लगभग 3.89 लाख मतदाता हैं और यहां का जातीय एवं सामाजिक समीकरण चुनाव परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाता है।
सबसे बड़ा वोट बैंक सवर्ण समाज का है, जिसकी संख्या करीब 1.25 से 1.30 लाख के बीच मानी जाती है। इनमें सबसे निर्णायक भूमिका कायस्थ समाज की है, जिनकी संख्या लगभग 65 हजार से अधिक बताई जाती है। इसके अलावा भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत मतदाता भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। कुल मिलाकर सवर्ण मतदाता करीब 33 प्रतिशत से अधिक हैं और परंपरागत रूप से भाजपा का मजबूत आधार माने जाते हैं।
दूसरी ओर वैश्य समाज के मतदाता लगभग 85 से 90 हजार बताए जाते हैं, जो इस सीट पर करीब 22 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। इसी वर्ग को साधने के लिए राजद ने एक बार फिर वैश्य समाज से आने वाली रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है।
मुस्लिम और यादव मतदाताओं का संयुक्त 'माई' समीकरण करीब 55 से 60 हजार वोटों का माना जाता है। इनमें लगभग 32 हजार मुस्लिम और 25 हजार यादव मतदाता शामिल हैं। यह वर्ग पारंपरिक रूप से राजद के साथ माना जाता है।इसके अलावा दलित और महादलित मतदाता लगभग 45 हजार तथा ओबीसी और ईबीसी वर्ग की संख्या करीब 70 हजार के आसपास मानी जाती है। यही वर्ग हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है।
रेखा गुप्ता पर राजद का भरोसा
राजद ने इस उपचुनाव में एक बार फिर रेखा गुप्ता पर भरोसा जताया है। वह पिछले विधानसभा चुनाव में भी भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ मैदान में थीं और उपविजेता रही थीं। पार्टी का मानना है कि वैश्य समाज की उम्मीदवार होने के कारण उन्हें पारंपरिक 'माई' समीकरण के साथ-साथ वैश्य वोटों का भी लाभ मिल सकता है। तेजस्वी यादव के रोड शो के बाद राजद कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा सकता और पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव के अंतिम चरण में इसका फायदा मतदान के दिन दिखाई देगा।
प्रशांत किशोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। उन्होंने बांकीपुर में नई राजनीति और विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई थी। उनका फोकस भाजपा के परंपरागत सवर्ण वोटों में सेंध लगाने और बदलाव चाहने वाले शहरी मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने पर था।
हालांकि तेजस्वी यादव के सक्रिय प्रचार के बाद राजद का पारंपरिक वोट बैंक फिर से एकजुट होता दिखाई दे सकता है। ऐसे में प्रशांत किशोर के लिए राजद समर्थक वोटों में सेंध लगाना पहले की तुलना में मुश्किल माना जा रहा है।राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में यदि जन सुराज को अपेक्षित वोट नहीं मिले तो प्रशांत किशोर तीसरे स्थान पर भी खिसक सकते हैं। हालांकि अंतिम फैसला मतदान के दिन मतदाताओं के रुख पर ही निर्भर करेगा।
भाजपा को क्यों दिख रही बढ़त?
बांकीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा का प्रदर्शन पिछले कई चुनावों से लगातार मजबूत रहा है। यहाँ पिछले कई विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार नितिन नवीन ने किला फतह किया है। पिछले दो चुनाव की बातें करें तो 2020 में करीब 59 प्रतिशत मत हासिल किए थे। इसके बाद 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर बढ़कर 63 प्रतिशत से अधिक पहुंच गया।
इस बार भाजपा ने नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया है और पार्टी दावा कर रही है कि उसका पारंपरिक वोट बैंक पूरी तरह उसके साथ है। भाजपा की रणनीति जातीय समीकरण के साथ-साथ शहरी विकास, संगठन की मजबूती और कोर वोटरों को मतदान केंद्र तक लाने पर केंद्रित है।
विपक्षी वोटों का बिखराव बन सकता है निर्णायक
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राजद और जन सुराज दोनों भाजपा विरोधी मतदाताओं में बराबर हिस्सेदारी लेने में सफल होते हैं तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। बांकीपुर का चुनावी इतिहास भी बताता है कि जब विपक्ष बंटा है, तब भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की है।
यही वजह है कि इस बार चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम विपक्ष नहीं रह गया है, बल्कि विपक्ष के भीतर भी मुख्य चुनौती बनने की होड़ दिखाई दे रही है। एक ओर राजद अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, वहीं दूसरी ओर प्रशांत किशोर अपनी नई पार्टी की राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं।
30 जुलाई को होगा फैसला
30 जुलाई को होने वाले मतदान में बांकीपुर की जनता तय करेगी कि भाजपा अपना अभेद्य किला बचाने में सफल होती है या तेजस्वी यादव का आक्रामक प्रचार राजद के पक्ष में माहौल बदल पाता है। वहीं यह चुनाव प्रशांत किशोर के लिए भी पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। ऐसे में पूरे बिहार की नजरें अब इस हाई-प्रोफाइल उपचुनाव के नतीजों पर टिकी हुई हैं।