Bihar News : भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में हुए कथित पुलिस एनकाउंटर ने बिहार की राजनीति और पुलिस प्रशासन दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पुलिस की गोली से घायल भरत भूषण तिवारी की पटना में इलाज के दौरान मौत के बाद मामला और गंभीर हो गया है। अब इस पूरे घटनाक्रम पर बिहार सरकार के मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय कुमार सिन्हा की प्रतिक्रिया ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
विजय सिन्हा ने साफ शब्दों में कहा कि-"यह बड़ा ही दुःखद घटना है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन मामले को सरकार गंभीरता से ली है। प्रशासन के लोग जिस चीज का आसानी से समाधान किया जा सकता है उसको इस तरह से अंजाम दिए हैं यह उचित नहीं है उनकी लापरवाही झलकी है।"
सबसे बड़ा सवाल- क्या यह फर्जी एनकाउंटर था?
भरत तिवारी की मौत के बाद ग्रामीणों और परिजनों का गुस्सा सड़क पर दिखाई दिया। लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। लेकिन इस घटना में सबसे बड़ा सवाल उस वीडियो को लेकर उठ रहा है जो अब सामने आया है। वीडियो मेंदेखा जा सकता है कि भरत तिवारी पुलिस के सामने सरेंडर करता है और अपने पास मौजूद पिस्टल पुलिसकर्मियों को सौंप देता है।
ऐसे में सवाल यह है कि जब भरत ने हथियार डाल दिया था, तो फिर उसके बाद गोली चलाने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर वह निहत्था हो चुका था, तो उसे चार-चार गोलियां क्यों मारी गईं? अगर पुलिस को अपनी जान का खतरा था, तो वीडियो में सरेंडर का दृश्य कैसे दिखाई दे रहा है?
पुलिस के दावों पर भी सवाल
घटना के बाद भोजपुर पुलिस की ओर से दावा किया गया था कि भरत तिवारी मानसिक रूप से विक्षिप्त था। यह भी कहा गया कि उसका इलाज कोईलवर मानसिक आरोग्यशाला में कराया गया था। पुलिस ने यह भी बताया था कि उसने पुलिस टीम को बंधक बनाने और धमकाने जैसी हरकतें की थीं। लेकिन अब सवाल यह है कि अगर भरत मानसिक रूप से बीमार था तो क्या उसे काबू में करने के लिए कोई वैकल्पिक रणनीति नहीं अपनाई जा सकती थी? क्या पुलिस ने मनोवैज्ञानिक या मेडिकल सहायता लेने की कोशिश की? क्या किसी प्रशिक्षित टीम को बुलाया गया था? और सबसे महत्वपूर्ण, यदि वह मानसिक रूप से अस्थिर था तो उसके साथ घातक बल प्रयोग अंतिम विकल्प क्यों बना?
मंत्री के बयान ने बढ़ाई पुलिस की मुश्किलें
आमतौर पर ऐसे मामलों में सरकार और पुलिस एक-दूसरे के बचाव में खड़े दिखाई देते हैं। लेकिन इस बार सरकार के ही वरिष्ठ मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने सार्वजनिक रूप से पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठा दिए हैं। उनका बयान इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सरकार भी प्रथम दृष्टया पुलिस कार्रवाई को लेकर पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। यही कारण है कि मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।
जनता जानना चाहती है जवाब
अब इस पूरे मामले में कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब मिलना बेहद जरूरी है— सरेंडर के बाद गोली चलाने का आदेश किसने दिया? पुलिस ने कितनी दूरी से फायरिंग की? अब इस मामले की मजिस्ट्रियल जांच होगी या न्यायिक जांच? क्या संबंधित पुलिसकर्मियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
जांच से ही सामने आएगी सच्चाई
भरत तिवारी की मौत अब केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। यह कानून, मानवाधिकार और पुलिस जवाबदेही से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है। एक तरफ पुलिस अपने दावे कर रही है, दूसरी तरफ सरेंडर का वीडियो और ग्रामीणों के आरोप पूरी कहानी को संदेह के घेरे में ला रहे हैं।
ऐसे में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच ही यह तय करेगी कि यह पुलिस की मजबूरी में हुई कार्रवाई थी या फिर ऐसा एनकाउंटर, जिसने बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल पूरा बिहार इस सवाल का जवाब जानना चाहता है—जब व्यक्ति ने हथियार डाल दिए थे, तो फिर गोलियां क्यों चलीं?