पटना/मोकामा : बिहार की सियासत में कभी अपनी दबंग छवि और राजनीतिक रसूख के लिए चर्चित रहे मोकामा विधायक अनंत सिंह इन दिनों चौतरफा मुश्किलों में घिरे नजर आ रहे हैं। पहले विधान परिषद चुनाव में अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर मोर्चा लेना भारी पड़ा। जनता दल यूनाइटेड ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता को लेकर विधानसभा अध्यक्ष के सामने मामला पहुंच गया।


इतना ही नहीं, नीलम देवी को सरकारी आवास खाली करने का आदेश भी जारी हो चुका है। यानी राजनीतिक मोर्चे पर कार्रवाई के बाद अब सरकारी स्तर पर भी दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।लेकिन इन तमाम घटनाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल अब अदालत से जुड़ा है। 30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दुलारचंद यादव हत्याकांड से जुड़े मामले में अनंत सिंह की जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई है।  शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत रद्द कर दिया है और अब मोकामा के 'छोटे सरकार' को एक बार फिर जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ेगा।


नीरज कुमार के खिलाफ खड़े होना पड़ा भारी

अनंत सिंह की मौजूदा मुश्किलों की शुरुआत बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक सीट के चुनाव से हुई। जेडीयू ने इस सीट से अपने पुराने और वरिष्ठ नेता नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया था। लेकिन अनंत सिंह पार्टी के इस फैसले से सहमत नहीं हुए।उन्होंने न सिर्फ नीरज कुमार का विरोध किया, बल्कि जन सुराज के उम्मीदवार डॉ. अनुज सिंह का समर्थन भी किया। चुनाव प्रचार के दौरान अनंत सिंह ने नीरज कुमार को हराने की बात तक कही।यह विरोध पार्टी नेतृत्व को नागवार गुजरा।


चुनाव के बाद जेडीयू ने बड़ा फैसला लेते हुए अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद पार्टी की ओर से विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग भी की गई।हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अनंत सिंह की विधायकी समाप्त होगी या नहीं, इसका अंतिम फैसला विधानसभा अध्यक्ष को करना है। पार्टी की ओर से मांग किए जाने भर से सदस्यता स्वत: समाप्त नहीं होती।दूसरी तरफ नीलम देवी के लिए भी मुश्किलें बढ़ गई हैं। उन्हें सरकारी आवास 25 नवंबर तक खाली करने का आदेश दिया गया है। यानी एक राजनीतिक टकराव के बाद कार्रवाई का दायरा पार्टी संगठन से निकलकर विधानसभा और सरकारी आवास तक पहुंच गया है।


अब सबसे बड़ा मोर्चा सुप्रीम कोर्ट में

राजनीतिक घटनाक्रम के बीच अनंत सिंह के सामने सबसे बड़ी कानूनी चुनौती दुलारचंद यादव हत्याकांड से जुड़ी है। अक्टूबर 2025 में मोकामा में चुनाव प्रचार के दौरान दुलारचंद यादव की मौत हुई थी। इस मामले में अनंत सिंह को 1 नवंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में बेऊर जेल भेज दिया गया। दिलचस्प बात यह रही कि जेल में रहते हुए भी अनंत सिंह ने विधानसभा चुनाव लड़ा और जेडीयू के टिकट पर जीत हासिल की। यानी जेल की सलाखों के पीछे रहते हुए उन्होंने राजनीतिक मैदान में अपनी पकड़ बनाए रखी और दोबारा विधायक बनने में कामयाब रहे।


करीब चार महीने जेल में रहने के बाद पटना हाई कोर्ट ने 19 मार्च 2026 को उन्हें जमानत दे दी। इसके बाद 23 मार्च को वह जेल से बाहर आए।लेकिन अब इसी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल खड़ा हो गया है। 30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में जमानत रद्द करने की याचिका पर सुनवाई हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने मोकामा के विधायक अनंत सिंह को 1 दिसंबर तक सरेंडर करके वापस जेल जाने का आदेश दिया है। अब  उन्हें दोबारा न्यायिक हिरासत में जाना पड़ सकता है।यही वजह थी कि 30 अक्टूबर की सुनवाई को अनंत सिंह के लिए बेहद अहम माना जा रहा था।


दस साल में कई बार जेल पहुंच चुके हैं अनंत सिंह

अनंत सिंह का जेल से सामना कोई पहली बार नहीं हो रहा है। पिछले करीब एक दशक में कई गंभीर मामलों में उनका नाम आया और उन्हें अलग-अलग मामलों में जेल जाना पड़ा।


2015: पुटुस यादव हत्याकांड

अनंत सिंह के जेल जाने का सिलसिला 2015 में तेज हुआ। जून 2015 में पुटुस यादव हत्याकांड के बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया।हालांकि, बाद में उन्हें इस मामले में जमानत मिल गई। इस मामले की खास बात यह रही कि जेल में रहते हुए ही अनंत सिंह ने 2015 का विधानसभा चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा और जीत हासिल की। यही वह दौर था जब उनकी राजनीतिक छवि और दबंग राजनीतिक प्रभाव की चर्चा बिहार से बाहर तक होने लगी थी।


2019: पैतृक घर से AK-47 और हैंड ग्रेनेड

इसके बाद अगस्त 2019 में अनंत सिंह एक बार फिर बड़े कानूनी विवाद में फंस गए। उनके पैतृक आवास से AK-47, कारतूस और हैंड ग्रेनेड बरामद होने का मामला सामने आया। पुलिस की कार्रवाई के बाद अनंत सिंह ने दिल्ली की अदालत में सरेंडर किया। उन्हें जेल भेज दिया गया।यह मामला उनके राजनीतिक जीवन के सबसे चर्चित कानूनी मामलों में शामिल रहा। जून 2022 में अदालत ने उन्हें हथियार बरामदगी के मामले में 10 साल की सजा सुनाई। इसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता भी चली गई।हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।अगस्त 2024 में पटना हाई कोर्ट ने हथियार बरामदगी से जुड़े मामलों में उनकी सजा को रद्द कर दिया और उन्हें बरी कर दिया। इसके बाद अनंत सिंह जेल से बाहर आए।


2025: जालालपुर गोलीबारी और फिर जेल

जनवरी 2025 में मोकामा के नौरंगा-जालालपुर इलाके में गोलीबारी का मामला सामने आया। इस केस में भी अनंत सिंह का नाम आया। उन्होंने अदालत में सरेंडर किया और उन्हें न्यायिक हिरासत में बेऊर जेल भेज दिया गया।कुछ महीनों बाद अगस्त 2025 में पटना हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद वह जेल से बाहर आए। लेकिन बाहर आने के कुछ ही समय बाद उनकी मुश्किलें फिर बढ़ गईं।


अक्टूबर-नवंबर 2025: दुलारचंद यादव हत्याकांड

अक्टूबर 2025 में दुलारचंद यादव की मौत ने मोकामा की राजनीति को हिला दिया। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान हुई इस घटना के बाद राजनीतिक माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया।मामले में अनंत सिंह को 1 नवंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया और बेऊर जेल भेज दिया गया।इस बार भी जेल अनंत सिंह की राजनीतिक यात्रा को रोक नहीं पाई। उन्होंने जेल में रहते हुए विधानसभा चुनाव लड़ा और जेडीयू के टिकट पर जीत दर्ज कर फिर से विधायक बन गए।फिर मार्च 2026 में हाई कोर्ट से जमानत मिली और वह जेल से बाहर आ गए। अब उसी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने जा रही है।


फिर जेल जाएंगे अनंत सिंह...

सुप्रीम कोर्ट ने मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह को 1 दिसंबर तक आत्मसमर्पण करके जेल जाने का आदेश दिया है। पटना हाईकोर्ट से मार्च में अनंत सिंह को दुलारचंद यादव हत्याकांड में मिली बेल को दुलारचंद के पोते नीरज कुमार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी और कोर्ट से उनकी जमानत रद्द करके फिर जेल भेजने की अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच में आज सुनवाई के दौरान अनंत सिंह के वकील ने बताया कि उनके परिवार में 25 नवंबर को एक शादी है, जिस पर कोर्ट ने उन्हें 1 दिसंबर तक सरेंडर करके जेल लौटने का आदेश दिया है। कोर्ट ने बिहार सरकार को 4 महीने में अपनी जांच पूरी करने कहा है, जिसके बाद अगली सुनवाई होगी।


सुप्रीम कोर्ट ने पिछली तारीख 29 सितंबर को सुनवाई के दिन ही संबंधित पक्षों को हिदायत दी थी कि 30 अक्टूबर को स्थगन नहीं दिया जाएगा। सितंबर में अनंत सिंह ने हलफनामा दाखिल करने के लिए कुछ समय मांगा था। मुकदमे में बिहार सरकार पार्टी नंबर 1 और अनंत सिंह पार्टी नंबर 2 हैं। राज्य सरकार ने 24 अक्टूबर को एफिडेविट दाखिल किया था।


अनंत सिंह की मौजूदा स्थिति को देखें तो उनके सामने एक साथ कई मोर्चे खुल गए हैं।एक तरफ जेडीयू ने उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया है। दूसरी तरफ विधानसभा अध्यक्ष के सामने उनकी सदस्यता का मामला पहुंच गया है। उनकी पत्नी नीलम देवी को सरकारी आवास खाली करने का आदेश मिल चुका है। और अब दुलारचंद यादव हत्याकांड में उनकी जमानत सुप्रीम कोर्ट की कसौटी पर है।यानी जिस नेता का मोकामा की राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव रहा, उसके सामने इस समय राजनीतिक और कानूनी दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी हैं।सबसे दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा घटनाक्रम की शुरुआत पार्टी के अंदर राजनीतिक टकराव से हुई। नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर खड़े होने के बाद अनंत सिंह पर कार्रवाई हुई और उसके बाद घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ता गया।