मोकामा के विधायक और बाहुबली नेता अनंत सिंह की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। दुलारचंद यादव हत्याकांड को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई के बीच सुप्रीम कोर्ट ने जमानत से जुड़े एक मामले में बड़ा आदेश सुनाया है। शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट की ओर से 19 मार्च 2026 को दिए गए जमानत संबंधी आदेश को अगली सुनवाई तक निलंबित कर दिया है। साथ ही संबंधित निजी प्रतिवादी को 4 दिसंबर 2026 तक या उससे पहले जांच अधिकारी के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब दुलारचंद यादव हत्याकांड से जुड़े घटनाक्रम पर सबकी निगाहें टिक गई हैं। खास बात यह है कि इस मामले में जांच अभी पूरी नहीं हुई है। शीर्ष अदालत ने जांच अधिकारी को चार महीने के भीतर जांच पूरी कर पूरक आरोपपत्र यानी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में जांच की दिशा और उससे सामने आने वाले तथ्यों को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दुलारचंद यादव हत्याकांड से कैसे जुड़ रहा है मामला?
दरअसल, मोकामा विधानसभा क्षेत्र में हुए दुलारचंद यादव हत्याकांड ने बिहार की राजनीति में काफी हलचल मचा दी थी। इस मामले में मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह का नाम सामने आने के बाद मामला और अधिक संवेदनशील हो गया। अनंत सिंह और उनके समर्थकों को लेकर कई तरह के सवाल उठे। पुलिस ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू की।
इस हत्याकांड के बाद अनंत सिंह की मुश्किलें लगातार बढ़ती चली गईं। मामला अदालत तक पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट से लेकर पटना हाईकोर्ट तक कानूनी लड़ाई का सिलसिला शुरू हुआ। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का 30 अक्टूबर 2026 का आदेश सामने आया है। तीन पन्नों के इस आदेश में शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट के जमानत संबंधी फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा है कि जमानत देते समय कुछ ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिनका इस मामले में विचार किया जाना जरूरी था।
हाईकोर्ट की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 13045/2026 के तहत पहुंचा था। याचिका में पटना हाईकोर्ट के 19 मार्च 2026 के जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी।30 अक्टूबर को न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनने और हाईकोर्ट के आदेश का अध्ययन करने के बाद शीर्ष अदालत ने जमानत आदेश को अगली सुनवाई तक निलंबित करने का फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पटना हाईकोर्ट ने संबंधित निजी प्रतिवादी को जमानत देते समय उसके सामने रखी गई प्रासंगिक सामग्री पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।अदालत ने विशेष रूप से तीन महत्वपूर्ण पहलुओं का जिक्र किया।पहला- अपराध की प्रकृति पर पर्याप्त विचार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कथित अपराध की गंभीरता और उसकी प्रकृति को जमानत देते समय उचित महत्व दिया जाना चाहिए था। अदालत के मुताबिक, हाईकोर्ट के फैसले में इस पहलू पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
दूसरा- राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का तर्क: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आकलन पर भी सवाल उठाया, जिसमें संबंधित व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़कर देखा गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल राजनीतिक दुश्मनी का आधार मानकर आपराधिक मामलों की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।तीसरा- आपराधिक इतिहास दर्ज करने में गलती: सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि संबंधित निजी प्रतिवादी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की संख्या को रिकॉर्ड करने में हाईकोर्ट से त्रुटि हुई थी।यानी सुप्रीम कोर्ट ने केवल जमानत देने के फैसले पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि उस फैसले के आधार में मौजूद तथ्यों और उनके मूल्यांकन पर भी आपत्ति जताई।
4 दिसंबर तक सरेंडर, जांच अधिकारी को चार महीने का समय
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जिसमें संबंधित निजी प्रतिवादी को 4 दिसंबर 2026 तक या उससे पहले जांच अधिकारी के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।अदालत ने साफ कहा है कि संबंधित व्यक्ति को जांच अधिकारी के समक्ष सरेंडर करना होगा। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने जांच एजेंसी के लिए भी समयसीमा तय कर दी है।
जांच अधिकारी को चार महीने के भीतर लंबित जांच पूरी करनी होगी और सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करनी होगी।इस निर्देश का मतलब है कि अब जांच एजेंसी को मामले से जुड़े बाकी पहलुओं की पड़ताल कर निर्धारित समय के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई करेगा।अदालत ने मामले को चार महीने बाद फिर से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।
क्या दुलारचंद हत्याकांड में खुलेंगे नए राज?
दुलारचंद यादव हत्याकांड में शुरुआत से ही कई सवाल उठते रहे हैं। आखिर उस दिन मोकामा में क्या हुआ था? घटना के पीछे कौन-कौन लोग थे? कथित हत्या में किसकी क्या भूमिका रही? और जांच पूरी होने के बाद पुलिस की पूरक चार्जशीट में कौन से नए तथ्य सामने आएंगे?अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इन सवालों का जवाब जांच की अगली कार्रवाई से मिलने की उम्मीद है।
खासकर सप्लीमेंट्री चार्जशीट को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। जांच अधिकारी को चार महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश मिला है। ऐसे में जांच एजेंसी के सामने मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण तथ्यों, साक्ष्यों और आरोपों की पड़ताल कर रिपोर्ट दाखिल करने की जिम्मेदारी होगी।
अनंत सिंह की राजनीतिक और कानूनी मुश्किलों के लिहाज से भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दुलारचंद यादव हत्याकांड के बाद से ही मोकामा की राजनीति में तनाव और बयानबाजी देखने को मिली है। अनंत सिंह की ओर से भी समय-समय पर इस मामले को लेकर अपनी बात रखी जाती रही है।
अब अनंत सिंह के लिए आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के 30 अक्टूबर के आदेश के बाद अब इस मामले में दो तारीखें और समयसीमाएं महत्वपूर्ण हो गई हैं। पहली, संबंधित निजी प्रतिवादी के आत्मसमर्पण की अंतिम तारीख 4 दिसंबर 2026 और दूसरी, जांच पूरी कर सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करने के लिए चार महीने की समयसीमा।
हालांकि, अदालत ने अभी आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। न ही इस आदेश को किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के जमानत आदेश को अगली सुनवाई तक निलंबित किया है और आगे की जांच पूरी करने का निर्देश दिया है।
अब देखना होगा कि जांच एजेंसी चार महीने के भीतर क्या रिपोर्ट पेश करती है और सप्लीमेंट्री चार्जशीट में कौन से नए तथ्य सामने आते हैं। दुलारचंद यादव हत्याकांड में अनंत सिंह की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश निश्चित तौर पर इस मामले की आगे की कानूनी लड़ाई को और महत्वपूर्ण बना देता है।फिलहाल मोकामा की राजनीति से लेकर अदालत तक सबकी नजरें इस बात पर हैं कि दुलारचंद यादव हत्याकांड की जांच में आगे क्या खुलासा होता है और अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या रहता है।