नालंदा : बिहार के नालंदा जिले में मिड-डे मील में हुई गंभीर लापरवाही के मामले में अब प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। नूरसराय प्रखंड के परासी मध्य विद्यालय में भोजन बनाते समय नमक की जगह डिटर्जेंट पाउडर मिला दिए जाने से 34 स्कूली बच्चे बीमार पड़ गए। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने दोषियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश दिया है। शिक्षा विभाग ने साफ कर दिया है कि बच्चों की जान और स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
घटना के बाद जांच में प्रथम दृष्टया लापरवाही सामने आने पर विद्यालय की तीन रसोइयों को कार्यमुक्त कर दिया गया है। कार्यमुक्त की गई रसोइयों में मंटू देवी, शारदा देवी और निपु देवी शामिल हैं। वहीं, विद्यालय के प्रधानाध्यापक शैलेन्द्र कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।
सबसे अहम बात यह है कि मामला अब केवल विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा। शिक्षा मंत्री के निर्देश के बाद दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी गई है। माना जा रहा है कि जांच में जिन लोगों की भूमिका सामने आएगी, उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ कानून के तहत भी कार्रवाई की जाएगी।
बीआरपी और आपूर्ति संस्था से 24 घंटे में जवाब
मामले में मिड-डे मील व्यवस्था की अनुश्रवण जिम्मेदारी संभाल रहे प्रखंड साधनसेवी यानी बीआरपी महेश प्रसाद से भी 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है। इसके अलावा भोजन आपूर्ति से जुड़ी संस्था एकता शक्ति फाउंडेशन के परियोजना प्रबंधक को भी जवाब देने का निर्देश दिया गया है।
विभाग ने चेतावनी दी है कि यदि संस्था की ओर से दिया गया जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और निबंधन रद्द करने तक की कार्रवाई हो सकती है। वहीं मिड-डे मील के डीपीओ पर भी आरोप पत्र गठित कर विभागीय कार्रवाई का आदेश दिया गया है।
शिक्षक को पहले भोजन चखना था, फिर बच्चों को परोसा जाता
शिक्षा विभाग के स्पष्ट निर्देश हैं कि मिड-डे मील बच्चों को परोसने से पहले विद्यालय के शिक्षक भोजन की गुणवत्ता की जांच करेंगे। शिक्षक को भोजन चखकर यह सुनिश्चित करना होता है कि खाना सुरक्षित और खाने योग्य है। इसके बाद ही बच्चों को भोजन दिया जाना चाहिए।
परासी मध्य विद्यालय की घटना ने इस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि यदि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार भोजन की जांच की गई होती तो क्या 34 बच्चे बीमार पड़ते? डिटर्जेंट जैसे हानिकारक पदार्थ की मिलावट समय रहते पकड़ी जा सकती थी।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, कई विद्यालयों में भोजन की गुणवत्ता जांचने के अनिवार्य नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा है। प्रतिबंधित सब्जियों और घटिया खाद्य सामग्री के इस्तेमाल पर रोक के बावजूद कई जगह लापरवाही की शिकायतें सामने आती रही हैं।
तीन महीने में 22 घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
बिहार में मिड-डे मील की गुणवत्ता को लेकर लगातार घटनाएं सामने आने से शिक्षा विभाग की चिंता बढ़ गई है। बीते तीन महीनों में मिड-डे मील से जुड़ी 22 घटनाएं सामने आ चुकी हैं। 19 अगस्त को अरवल जिले के 75 स्कूलों में मिड-डे मील में कीड़े मिलने की शिकायत के बाद भोजन वितरण पर रोक लगा दी गई थी। मधेपुरा में मिड-डे मील में छिपकली मिलने की घटना के बाद करीब 70 छात्र बीमार पड़ गए थे। इसके अलावा खगड़िया में भोजन में कीड़ा मिलने और सहरसा में गंदगी की शिकायत जैसे मामले भी सामने आ चुके हैं।
लगातार हो रही इन घटनाओं के बीच नालंदा का मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां भोजन में नमक की जगह कथित तौर पर डिटर्जेंट पाउडर मिला दिया गया। यह साधारण लापरवाही नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डालने वाला मामला माना जा रहा है।
शिक्षा मंत्री का सख्त संदेश
शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने साफ कहा है कि मिड-डे मील योजना बच्चों को पौष्टिक और ताजा भोजन उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई है। इसमें किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। भोजन बच्चों को देने से पहले उसकी गुणवत्ता की जांच करना अनिवार्य है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नालंदा मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जांच किस स्तर तक पहुंचती है और किन-किन लोगों की जिम्मेदारी तय की जाती है। फिलहाल तीन रसोइयों को कार्यमुक्त करने, प्रधानाध्यापक को निलंबित करने और संबंधित अधिकारियों व संस्था से जवाब मांगने के बाद विभाग ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि 34 बच्चों की तबीयत बिगड़ने के मामले में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई केवल कागजी नहीं, बल्कि कानूनी स्तर पर भी होगी।