Chhath Puja 2026: छठ महापर्व आते ही बिहार के घरों में पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई देने लगती है. शारदा सिन्हा के छठ गीतों से लेकर गांवों में गाई जाने वाली पुरानी लोकधुनों तक, इस पर्व का संगीत से गहरा रिश्ता रहा है. लेकिन बिहार के छठ गीतों का इतिहास सिर्फ भक्ति और आस्था तक सीमित नहीं है. इन गीतों में कभी महंगाई, गरीबी, पलायन और परिवार से बिछड़ने का दर्द भी सुनाई देता था. मुजफ्फरपुर की लोकगायिका काली देवी की गायिकी इसका एक खास उदाहरण है. वहीं, शहर के चतुर्भुज स्थान की तवायफों ने भी संगीत, नृत्य और कविता के जरिए बिहार की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया था. आज इस परंपरा का बड़ा हिस्सा लोगों की यादों और शोध के पन्नों तक सिमटता जा रहा है.
छठ गीतों में महंगाई और गरीबी की कहानी
मुजफ्फरपुर की काली देवी से जुड़े गीतों में ‘मोरे भैया महंगा मुंगेर’ का खास जिक्र मिलता है. इस गीत में छठ पूजा की तैयारी के दौरान एक आम परिवार की आर्थिक परेशानी को दिखाया गया है. बहन अपने भाई से छठ के लिए जरूरी सामान लाने की बात कहती है, लेकिन भाई महंगाई और पैसों की कमी का हवाला देता है.
इस गीत की खासियत यह है कि इसमें पूजा की तैयारियों के साथ उस दौर के परिवारों की आर्थिक स्थिति भी दिखाई देती है. छठ करने की इच्छा, जरूरी सामान जुटाने की चिंता और महंगाई से पैदा हुई परेशानी को लोकगीत के जरिए आवाज दी गई थी.
लोकगीतों में दर्ज था पलायन का दर्द
बिहार में रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने का सिलसिला नया नहीं है. पुराने लोकगीतों में भी परिवार से दूर रहने और आर्थिक मजबूरी का दर्द सुनाई देता रहा है. काली देवी की गायिकी से जुड़े गीतों में भी इन सामाजिक परिस्थितियों की झलक मिलती है.
‘बांस के बंगइया’ जैसे पारंपरिक छठ गीतों का जिक्र करते हुए उनकी गायिकी की चर्चा होती है. इन गीतों को सिर्फ धार्मिक परंपरा के रूप में देखना इनके सामाजिक महत्व को सीमित कर देता है. इनके बोलों में ग्रामीण जीवन, पारिवारिक रिश्ते और उस समय के लोगों की परेशानियां भी दर्ज हैं.
चतुर्भुज स्थान की तवायफें भी थीं संगीत और कला की जानकार
मुजफ्फरपुर का चतुर्भुज स्थान लंबे समय से एक अलग सामाजिक पहचान के साथ जाना जाता है, लेकिन इसका एक सांस्कृतिक इतिहास भी रहा है. यहां की तवायफें केवल नृत्य और गायिकी तक सीमित नहीं थीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत, कविता और अदब की भी अच्छी जानकार थीं.
एक शोधपत्र में चतुर्भुज स्थान की तवायफों की संगीत और नृत्य परंपरा का उल्लेख मिलता है. उन्हें उस समय के रईसों और प्रभावशाली लोगों का संरक्षण भी हासिल था. संगीत की महफिलें, गायिकी और कलात्मक प्रस्तुतियां इस इलाके की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा थीं.
समय के साथ सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां बदलीं. चतुर्भुज स्थान की पहचान भी धीरे-धीरे उसकी पुरानी संगीत परंपरा से दूर होती चली गई. आज इस इलाके का जिक्र अधिकतर उसकी दूसरी सामाजिक पहचान के संदर्भ में होता है, जबकि यहां की कला और संगीत की विरासत पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है.
कौन थीं मुजफ्फरपुर की काली देवी?
उपलब्ध शोध सामग्री के अनुसार, काली देवी का जन्म वर्ष 1920 में मुजफ्फरपुर में हुआ था. उन्होंने लोकगायिकी के जरिए अपने समय के सामाजिक जीवन और आम लोगों की भावनाओं को गीतों में जगह दी. वर्ष 1984 में उन्होंने दिल्ली में आयोजित महिला संगीत समारोह में भी अपनी प्रस्तुति दी थी. वर्ष 2003 में उनका निधन हो गया.
उनकी गायिकी इस बात का उदाहरण है कि बिहार की लोकसंगीत परंपरा में कई ऐसी महिला कलाकार रही हैं, जिनका योगदान लोकप्रिय संगीत के इतिहास में उतनी जगह नहीं पा सका, जितनी मिलनी चाहिए थी.
पुराने छठ गीतों की विरासत को कौन सहेजेगा?
आज छठ गीतों की रिकॉर्डिंग और प्रसारण के लिए डिजिटल माध्यम उपलब्ध हैं. नए कलाकार भी पारंपरिक गीतों को नए अंदाज में पेश कर रहे हैं. इसके बावजूद पुराने लोकगीतों, ग्रामोफोन रिकॉर्ड और उन कलाकारों की यादों को सुरक्षित रखने की जरूरत बनी हुई है, जिन्होंने बिहार की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया.
काली देवी जैसी लोकगायिकाओं और चतुर्भुज स्थान की संगीत परंपरा का इतिहास बताता है कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत का दायरा काफी बड़ा रहा है. इसमें उन महिलाओं की आवाजें भी शामिल हैं, जिन्हें सामाजिक पहचान और परिस्थितियों के कारण लंबे समय तक पर्याप्त जगह नहीं मिली.