Bihar News: बिहार की पहचान बन चुकी मुजफ्फरपुर की मशहूर शाही लीची इस बार किसानों के चेहरे पर मिठास नहीं, बल्कि चिंता लेकर आई है। मौसम के लगातार बदलते मिजाज ने इस साल लीची की फसल को बुरी तरह प्रभावित किया है। हालात ऐसे हैं कि कई बागानों में 60 से 70 फीसदी तक फसल खराब होने की बात सामने आ रही है। कभी तेज गर्मी, कभी बेमौसम बारिश और ऊपर से कीटों के हमले ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है।
मुजफ्फरपुर, वैशाली और पश्चिम चंपारण के कई इलाकों में इस बार पेड़ों पर वैसी लीची नहीं दिख रही, जैसी हर साल दिखाई देती थी। आमतौर पर इस मौसम में बागानों में लाल और गुलाबी रंग की लीचियों की बहार रहती है, लेकिन इस बार कई पेड़ लगभग खाली नजर आ रहे हैं। किसान बताते हैं कि जो फल बचे भी, उनमें पहले जैसी चमक और मिठास भी नहीं है।
मुजफ्फरपुर को देश की लीची राजधानी कहा जाता है। यहां की शाही लीची सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि देश और विदेश तक मशहूर है। इसकी खुशबू और स्वाद की वजह से इसे GI Tag भी मिला हुआ है। लेकिन इस बार मौसम ने पूरा खेल बिगाड़ दिया।
बिहार लीची एसोसिएशन से जुड़े किसानों का कहना है कि इस साल उत्पादन काफी कम हुआ है। कई बागानों में सिर्फ 25 से 30 फीसदी तक ही लीची बच पाई है। किसान बच्चा सिंह बताते हैं कि पिछले साल जिन बागानों से हजारों बॉक्स लीची निकलती थी, वहां इस बार बहुत कम उत्पादन हुआ है। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
दरअसल, लीची की खेती पूरी तरह मौसम पर निर्भर मानी जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक नवंबर और दिसंबर में पर्याप्त ठंड नहीं पड़ने से पेड़ों पर सही तरीके से फूल नहीं आ पाए। फूल आने की जगह नई पत्तियां निकलने लगीं। इसके बाद फरवरी और मार्च में बादल और हल्की बारिश ने स्थिति और खराब कर दी। इसी दौरान “फ्लॉवर वेबर” नाम के कीट ने फूलों पर हमला कर दिया, जिससे बड़ी संख्या में फूल खराब हो गए।
इतना ही नहीं, अप्रैल में तापमान अचानक काफी बढ़ गया। तेज गर्मी और लू की वजह से जो लीची बन भी रही थी, वह समय से पहले झड़ने लगी। कई जगहों पर तेज हवा और आंधी ने भी नुकसान पहुंचाया। किसानों का कहना है कि पेड़ों पर फल टिक ही नहीं पाए।
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (NRCL) के वैज्ञानिकों का भी मानना है कि climate change का असर अब साफ तौर पर लीची उत्पादन पर दिखाई देने लगा है। मौसम का संतुलन बिगड़ने से फसल की मात्रा और quality दोनों प्रभावित हो रही हैं।
मुजफ्फरपुर जिले में करीब 12 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती होती है। बिहार अकेले देश का लगभग 43 प्रतिशत लीची उत्पादन करता है। ऐसे में फसल खराब होने का असर सिर्फ किसानों पर नहीं, बल्कि बाजार और कारोबार पर भी पड़ रहा है।
किसान भोला नाथ झा बताते हैं कि उनके बड़े बागान से पहले 20 से 25 हजार बॉक्स लीची निकलती थी, लेकिन इस बार मुश्किल से 7 से 8 हजार बॉक्स ही तैयार हो पाए हैं। खर्च पहले जैसा ही हुआ, लेकिन उत्पादन काफी कम हो गया। ऐसे में मुनाफा तो दूर, लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।
फसल कम होने का असर बाजार में भी दिखने लगा है। इस बार लीची की कीमतें बढ़ सकती हैं। व्यापारी भी मान रहे हैं कि supply कम होने से दाम ऊपर जा सकते हैं। हालांकि किसानों का कहना है कि ज्यादा कीमत का फायदा भी उन्हें पूरा नहीं मिल पाता, क्योंकि उत्पादन बहुत कम हुआ है।