Bihar Police Scam: बिहार पुलिस में वर्दी की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था संभालने की होती है, लेकिन मुजफ्फरपुर के करीब 16 साल पुराने एक मामले ने वर्दी के भीतर छिपे उस खेल को उजागर कर दिया, जिसमें सरकारी खजाने से निकलने वाले पैसे ने रास्ता ही बदल लिया। मामला इतना बड़ा था कि रकम सुनकर कैलकुलेटर भी शायद दोबारा गिनती करने लगे।
पुलिस पर ही अधिकारियों और सिपाहियों के वेतन, एरियर और दूसरे लाभ की सात करोड़ रुपये से अधिक की राशि में हेराफेरी का आरोप लगा। अब इस मामले में तत्कालीन महिला सिपाही बेबी कुमारी को अदालत ने दोषी करार दिया है।
मुजफ्फरपुर की विशेष निगरानी अदालत ने सोमवार को लखीसराय निवासी बेबी कुमारी को भ्रष्टाचार और गबन से जुड़े मामले में दोषी माना। दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। अब सबकी नजर 26 अक्टूबर पर है, जब अदालत सजा के बिंदु पर सुनवाई करेगी। यानी जिस मामले की कहानी करीब डेढ़ दशक पहले शुरू हुई थी, उसमें अब अदालत ने एक अहम पड़ाव पार कर लिया है।
कहानी की शुरुआत साल 2010 में हुई थी। एक अक्टूबर 2010 को तत्कालीन डीएसपी मुख्यालय ने मुजफ्फरपुर नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोप था कि पुलिसकर्मियों को मिलने वाली सरकारी राशि में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई। जांच आगे बढ़ी तो मामला सिर्फ कुछ हजार या लाख रुपये की अनियमितता का नहीं निकला, बल्कि सात करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी रकम के कथित गबन तक जा पहुंचा।
जांच के मुताबिक, पुलिस कार्यालय के तत्कालीन अकाउंटेंट सुषील कुमार चौधरी पर आरोप लगा कि वर्ष 2006 से सितंबर 2010 के बीच पुलिसकर्मियों के मासिक वेतन, यात्रा भत्ता और दूसरे बिलों के जरिए सरकारी राशि में हेराफेरी की गई। आरोप यह भी था कि रकम को अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कराया गया। इन खातों में बेबी कुमारी का खाता भी शामिल बताया गया।
अदालती रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी के मुताबिक, बेबी कुमारी के खाते में एक ही दिन 17 लाख रुपये जमा होने की बात सामने आई थी। यानी जिस खाते में सामान्य तौर पर वेतन और रोजमर्रा के खर्च का हिसाब होना चाहिए था, वहां अचानक लाखों रुपये की एंट्री ने जांच एजेंसियों की नजर खींच ली।
उसके बाद तलाशी के दौरान बेबी कुमारी के घर से नकदी, आभूषण और निवेश से जुड़े दस्तावेज बरामद होने की जानकारी भी सामने आई।
मामला सिर्फ सरकारी पैसे के कथित गबन तक सीमित नहीं रहा। बेबी कुमारी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला भी सामने आया। विशेष निगरानी अदालत ने इसी मामले में उन्हें दोषी ठहराया है। अदालत में सुनवाई के दौरान उनकी ओर से अपनी संपत्ति और रकम के स्रोत को लेकर अलग-अलग दलीलें भी दी गई थीं। उन्होंने अपनी आय में वेतन से बचत, पति की सेवा से जुड़े लाभ, एलआईसी बोनस और दूसरी आमदनी का हवाला दिया था।
लेकिन सरकारी पक्ष ने इन दावों पर सवाल उठाए। सवाल सीधा था—अगर इतनी रकम वैध तरीके से जमा की गई थी तो उसके समर्थन में ठोस दस्तावेज कहां हैं? अदालत के सामने नकदी और संपत्ति के स्रोत को लेकर यही सवाल मामले का अहम हिस्सा बना। पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक, जांच के दौरान सह-आरोपियों के परिसरों से भी बड़ी मात्रा में नकदी और आभूषण बरामद किए गए थे।
दिलचस्प बात यह है कि यह मामला आज का नहीं है। 2010 में प्राथमिकी, 2012 में निगरानी थाना कांड और अब 2026 में दोषसिद्धि। करीब 16 साल का लंबा सफर बताता है कि सरकारी पैसे की हेराफेरी का हिसाब अदालत तक पहुंचने में वक्त जरूर लग सकता है, लेकिन फाइल अगर बंद नहीं हुई तो कहानी किसी न किसी दिन फिर खुलती है।
अदालत के इस फैसले के बाद अब अगला बड़ा सवाल सजा का है। 26 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में यह तय होगा कि दोषी करार दी गई बेबी कुमारी को कितनी सजा मिलती है। फिलहाल उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है।
मुजफ्फरपुर का यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यहां रकम किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि पुलिसकर्मियों के वेतन और सरकारी भुगतान से जुड़ी बताई गई थी। यानी जिस पैसे से वर्दी पहनकर ड्यूटी करने वालों की तनख्वाह जानी थी, उसी रकम के इधर-उधर होने का आरोप लगा। अब अदालत के दोषी करार देने के बाद इस पुराने घोटाले की कहानी का अगला अध्याय 26 अक्टूबर को खुलेगा।