लखीसराय : सुप्रसिद्ध अशोकधाम मंदिर में बीते सोमवार को हुई दर्दनाक भगदड़ ने सात महिलाओं की जान ले ली। कई परिवारों के घरों का चिराग बुझ गया और श्रद्धा के लिए मंदिर पहुंचे लोग मातम में डूब गए। लेकिन हादसे के बाद जो जांच रिपोर्ट सामने आई है, उसने त्रासदी के कारणों से ज्यादा प्रशासनिक व्यवस्था और जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जिलास्तरीय जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट डीएम शैलेंद्र कुमार को सौंप दी है। एडीएम नीरज कुमार की अगुवाई में बनी इस टीम ने हादसे के पीछे मुख्य रूप से दो कारण बताए—बिजली का खंभा गिरना और कमजोर बांस-बल्ले की बैरिकेडिंग। सवाल यह है कि क्या सात लोगों की मौत जैसी बड़ी त्रासदी की पूरी कहानी सिर्फ एक बिजली के खंभे और कमजोर बैरिकेडिंग तक सीमित है? या फिर जांच की दिशा ही इस तरह तय की गई कि असली जिम्मेदारों तक सवाल पहुंचने से पहले जवाबदेही का रास्ता बदल दिया जाए?

पोल गिरा, लेकिन व्यवस्था का पोल कब खुलेगा?

जांच रिपोर्ट के मुताबिक बिजली का पोल गिरने के बाद श्रद्धालुओं में अफरातफरी मची और भीड़ का दबाव बढ़ने पर कमजोर बैरिकेडिंग जवाब दे गई। नतीजा—भगदड़ और सात महिलाओं की मौत। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि सावन के दौरान अशोकधाम में लाखों श्रद्धालुओं के आने की संभावना कोई अचानक पैदा हुई स्थिति थी क्या? क्या प्रशासन को पहले से यह जानकारी नहीं थी कि मंदिर परिसर और प्रवेश मार्गों पर भारी भीड़ उमड़ सकती है? यदि जानकारी थी, तो क्या मजबूत बैरिकेडिंग की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए थी?

और अगर एक बिजली का खंभा इतनी बड़ी भीड़ के बीच हादसे का कारण बन सकता था, तो उसकी सुरक्षा जांच पहले क्यों नहीं हुई? सवाल यह भी है कि क्या किसी ने पहले से यह आकलन किया था कि पोल गिरने की स्थिति में भीड़ किस दिशा में भागेगी और उसे कैसे नियंत्रित किया जाएगा? पोल गिरा, बैरिकेडिंग टूटी, लेकिन क्या पूरी प्रशासनिक व्यवस्था भी उसी समय टूट गई थी?

जिनकी व्यवस्था की जिम्मेदारी, उन्हीं के सामने जांच का सवाल

सबसे गंभीर सवाल जांच टीम की निष्पक्षता को लेकर उठ रहा है। जिन अधिकारियों और विभागों की जिम्मेदारी मंदिर परिसर में भीड़ नियंत्रण और व्यवस्था संभालने की थी, उसी प्रशासनिक तंत्र के भीतर जांच कराई गई। ऐसे में क्या जांच से यह उम्मीद की जा सकती थी कि वह अपने ही सिस्टम की गंभीर खामियों को पूरी तरह सामने लाएगी? रिपोर्ट में किसी बड़े प्रशासनिक अधिकारी या जिम्मेदार व्यक्ति की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं की गई। किसी को दोषी नहीं ठहराया गया। किसी की लापरवाही का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। तो फिर सात मौतों का जिम्मेदार कौन है? क्या बिजली का खंभा ही आरोपी है? क्या बांस-बल्ले की बैरिकेडिंग ही दोषी है? या फिर उन लोगों से सवाल पूछना ही जांच के दायरे में शामिल नहीं किया गया, जिनके पास भीड़ प्रबंधन की पूरी कमान थी?

सुरक्षा बलों की भूमिका पर चुप्पी क्यों?

जांच टीम ने कई बिंदुओं पर पड़ताल करने का दावा किया है। पोल क्यों गिरा, वहां मौजूद कर्मियों की भूमिका क्या थी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जाए—इन मुद्दों पर चर्चा की गई। लेकिन सबसे अहम सवालों में से एक पर रिपोर्ट खामोश नजर आती है। भगदड़ के वक्त प्रवेश और निकास द्वार पर तैनात सुरक्षा बल क्या कर रहे थे? भीड़ को किस तरह नियंत्रित किया जा रहा था? क्या अलग-अलग रास्तों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग व्यवस्था थी? क्या कहीं भीड़ क्षमता से ज्यादा हो जाने पर प्रवेश रोकने की योजना बनाई गई थी?इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलना जांच की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है। क्योंकि भगदड़ सिर्फ किसी चीज के गिरने से नहीं होती, भगदड़ तब जानलेवा बनती है जब भीड़ को संभालने की व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है।

क्राउड मैनेजमेंट को आखिर जांच से बाहर क्यों रखा गया?

इस पूरे हादसे में सबसे बड़ा शब्द होना चाहिए था—क्राउड मैनेजमेंट। लेकिन जांच रिपोर्ट में यही मुद्दा सबसे कमजोर दिखाई देता है। सावन में अशोकधाम में भारी भीड़ आती है। यह प्रशासन के लिए कोई नई जानकारी नहीं थी। ऐसे में भीड़ की संख्या का अनुमान क्या लगाया गया था? अतिरिक्त पुलिस बल की कितनी व्यवस्था थी? मेडिकल टीम कितनी दूरी पर मौजूद थी? एंट्री और एग्जिट का प्लान क्या था? आपात स्थिति में भीड़ को निकालने का रास्ता कौन सा था?अगर ये सवाल पहले तय किए गए होते, तो शायद एक पोल गिरने के बाद सात जिंदगियां नहीं जातीं।यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है—क्या जांच हादसे की जड़ तक पहुंची है या सिर्फ उस कारण तक, जिसे सबसे आसानी से जिम्मेदार ठहराया जा सकता था?

बिजली विभाग पर ठीकरा, प्रशासन को राहत?

जांच का निष्कर्ष पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि बड़ी जिम्मेदारी बिजली विभाग और भवन प्रमंडल की तरफ मोड़ दी गई है। पोल और बैरिकेडिंग को मुख्य कारण बताकर मामला तकनीकी खामी तक सीमित कर दिया गया।लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी का क्या? अगर किसी धार्मिक आयोजन में लाखों लोगों की भीड़ जुटती है, तो क्या पूरी जवाबदेही सिर्फ बिजली के खंभे और बैरिकेडिंग की गुणवत्ता तक सीमित हो सकती है? भीड़ की निगरानी, सुरक्षा बलों की तैनाती, प्रवेश नियंत्रण, आपातकालीन निकासी और मौके पर त्वरित कार्रवाई—इन सबकी जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? सात महिलाओं की मौत के बाद भी अगर जांच किसी जिम्मेदार व्यक्ति का नाम तय नहीं करती, तो पीड़ित परिवार यह सवाल जरूर पूछेंगे कि आखिर जांच हुई किसकी?

डीएम की समीक्षा के बाद क्या बदलेगा?

एडीएम नीरज कुमार का कहना है कि जांच रिपोर्ट सौंप दी गई है और डीएम की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी। अब निगाहें डीएम शैलेंद्र कुमार की समीक्षा पर हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या समीक्षा सिर्फ रिपोर्ट को मंजूरी देने तक सीमित रहेगी, या फिर उन सवालों को भी उठाया जाएगा जिन पर जांच टीम चुप रही?सात महिलाओं की मौत किसी फाइल का आंकड़ा नहीं है। यह सात परिवारों की जिंदगी का स्थायी दर्द है। इसलिए जांच का मकसद केवल हादसे का तकनीकी कारण ढूंढना नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय करना होना चाहिए, जिसकी कमजोरियों ने एक हादसे को जानलेवा त्रासदी में बदल दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—अशोकधाम में सिर्फ बिजली का खंभा गिरा था, या फिर जवाबदेही की पूरी व्यवस्था भी?