कटिहार: बिहार के कटिहार जिले में भूमि सुधार उप समाहर्ता (DCLR) शशांक बर्णवाल के कामकाज को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। स्थानीय लोगों और मामले से जुड़े शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि DCLR कार्यालय में भूमि विवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान नियमों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है। कुछ मामलों में रिश्वत की मांग करने और पैसे नहीं देने पर पक्षकारों के खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित करने का भी आरोप लगाया गया है।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि मामले को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक शिकायत पहुंचाई गई है। उनका कहना है कि कार्रवाई के लिए पत्राचार होने के बावजूद अब तक संबंधित अधिकारी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना बाकी है।
एक ही मामले में बार-बार आदेश देने का आरोप
शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, कटिहार DCLR शशांक बर्णवाल पर भूमि विवाद से जुड़े मामलों में प्रक्रिया के विपरीत निर्णय देने के आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में एक ही प्रकरण में दो या तीन बार फैसला सुनाए जाने जैसी स्थिति भी सामने आई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि भूमि से जुड़े मामलों में आदेश का सीधा असर आम लोगों के अधिकार और संपत्ति पर पड़ता है। ऐसे में सुनवाई, दस्तावेजों की जांच और दोनों पक्षों को पर्याप्त अवसर देना बेहद महत्वपूर्ण है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इन प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई।
केस नंबर 1075/2024-25 में क्या है आरोप?
शिकायत में केस संख्या 1075/2024-25 का भी उल्लेख किया गया है। यह मामला बासगीत पर्चा की जमीन से संबंधित बताया जा रहा है। आरोप है कि अपीलकर्ता ने अपने और अपने पिता के नाम जारी बंदोबस्ती पर्चे से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए थे, लेकिन उनकी निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस मामले में करीब एक लाख रुपये की रिश्वत की मांग की गई थी। पैसे नहीं देने के बाद मामले में अपीलकर्ता के खिलाफ फैसला सुनाए जाने का आरोप लगाया गया है। शिकायत में यह भी कहा गया है कि जिस पक्ष के पक्ष में आदेश हुआ, वह 20 नवंबर 2025 से सुनवाई की प्रक्रिया में अनुपस्थित था। इसके बावजूद उसके पक्ष में फैसला दिए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि किसी स्वतंत्र जांच या न्यायिक निष्कर्ष से नहीं हुई है।
कुरसेला के केस में भी उठे सवाल
कटिहार के कुरसेला से जुड़े केस संख्या 447/2024-25 को लेकर भी शिकायत की गई है। आरोप है कि इस मामले में केवल एक बार बहस होने के बाद अंतिम आदेश पारित कर दिया गया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आदेश में पर्याप्त साक्ष्यों और दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। उनका आरोप है कि इस तरह आदेश पारित करना निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं है। शिकायत में पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की गई है।
कोढ़ा का मामला सबसे गंभीर
केस संख्या 1099/2024-25, जो कोढ़ा प्रखंड से जुड़ा बताया जा रहा है, शिकायत में सबसे गंभीर मामलों में शामिल है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, इस मामले में आदिवासी समाज के कुछ परिवार करीब 100 वर्षों से संबंधित जमीन पर घर बनाकर रह रहे हैं।दावा किया गया है कि इन परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान भी बनाए गए हैं। आरोप है कि जमीन विवाद के मामले में रिश्वत की मांग की गई और मांग पूरी नहीं होने पर स्थानीय अंचल अधिकारी (CO) की रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया गया।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इसके बाद इन परिवारों को उनकी जमीन से बेदखल करने की कार्रवाई की कोशिश की जा रही है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला बेहद गंभीर हो सकता है, क्योंकि इसमें लंबे समय से रह रहे परिवारों के आवास और भूमि अधिकार का सवाल जुड़ा हुआ है।
PMO तक पहुंची शिकायत, जांच की मांग
मामले को लेकर शिकायतकर्ताओं ने प्रधानमंत्री कार्यालय तक भी शिकायत भेजे जाने का दावा किया है। उनका कहना है कि PMO की ओर से संबंधित स्तर पर कार्रवाई के लिए पत्राचार किया गया, लेकिन इसके बावजूद अभी तक DCLR के खिलाफ कोई स्पष्ट दंडात्मक कार्रवाई सामने नहीं आई है।
स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री और राज्य सरकार से पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि आरोप गलत हैं तो जांच के जरिए स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
अधिकारी का पक्ष सामने आना बाकी
DCLR शशांक बर्णवाल पर लगाए गए रिश्वतखोरी, नियमों की अनदेखी और पक्षपातपूर्ण आदेश के आरोप फिलहाल शिकायतकर्ताओं के दावों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित अधिकारी या जिला प्रशासन की ओर से इस मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।भूमि विवाद से जुड़े मामलों में पारदर्शी सुनवाई और दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। ऐसे में शिकायतों की निष्पक्ष जांच और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई ही पूरे विवाद का समाधान कर सकती है।