Bihar News: बिहार के कटिहार जिले के आजमनगर अंचल से सामने आया ताजा मामला सुशासन के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। यहां अंचल कार्यालय में पारदर्शिता की बजाय कथित तौर पर बिचौलियों का दबदबा देखने को मिल रहा है, जिससे आम लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है।


म्यूटेशन के नाम पर ऑनलाइन घूस का आरोप

मामला जमीन म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) से जुड़ा है, जिसमें ₹30,000 की ऑनलाइन वसूली का आरोप लगा है। पीड़ितों का कहना है कि यह रकम एक बिचौलिए के जरिए डिजिटल माध्यम से ली गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भुगतान किसी निजी व्यक्ति के बजाय एक कथित “ऑपरेटर” के नंबर पर कराया गया, जिससे पूरे सिस्टम की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।


पीड़ितों का आरोप: पैसे नहीं दिए तो आवेदन रद्द

पीड़ित भू-स्वामी इफ्तेखार आलम और उनके मित्र जुल्फकार ने बताया कि कुल छह म्यूटेशन मामलों के लिए बड़ी रकम की मांग की गई थी। उनका आरोप है कि जब उन्होंने पूरी रकम देने से पहले काम पूरा करने की बात कही, तो उनके सभी आवेदन—जिनमें म्यूटेशन वाद संख्या 4171/2025-26 भी शामिल है—रद्द कर दिए गए, जबकि रिपोर्ट सकारात्मक थी।


जुल्फकार के मुताबिक

“हमने बताए गए व्यक्ति को ऑनलाइन भुगतान किया, लेकिन जब बाकी पैसे देने में देरी हुई तो गुस्से में हमारे सारे आवेदन खारिज कर दिए गए।”


वायरल तस्वीर से बढ़ा विवाद

इस मामले को और तूल तब मिला जब सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई। इस तस्वीर में एक बाहरी युवक कथित तौर पर अंचल कार्यालय की सरकारी कुर्सी पर बैठा दिखाई दे रहा है। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर किसके संरक्षण में बाहरी लोग सरकारी दफ्तरों में इस तरह हस्तक्षेप कर रहे हैं।


अधिकारियों की सफाई

अंचलाधिकारी मो. रिजवान आलम ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि जिस व्यक्ति पर आरोप लगाए जा रहे हैं, वह कार्यालय का कर्मचारी नहीं है और म्यूटेशन रद्द होने से नाराज होकर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं।


डीएम का सख्त रुख, जांच के आदेश

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। जिलाधिकारी आशुतोष द्विवेदी ने स्पष्ट कहा है कि सरकारी कार्यालयों में बिचौलियागिरी किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने पूरे मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है।


जांच में खुल सकते हैं और राज

सूत्रों का मानना है कि अगर संबंधित बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की गहराई से जांच की जाए, तो इस मामले में और भी लोगों की संलिप्तता सामने आ सकती है। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर रहा है, जिससे आम जनता में नाराजगी और अविश्वास बढ़ता दिख रहा है।