कैमूर में एक बार फिर पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में है। सवाल इसलिए, क्योंकि अगर किसी व्यक्ति को पुलिस पकड़ने जाती है तो क्या उसकी पहचान बताना जरूरी नहीं? क्या सादे कपड़ों में किसी को पीछे से कॉलर पकड़कर घसीटना कानून का हिस्सा है? और अगर सामने वाला इसे अपहरण समझकर विरोध करे, तो क्या उसका जवाब लाठियों से दिया जाएगा? यही सवाल अब कुदरा थाना क्षेत्र के देवकली गांव के रहने वाले लखन चौधरी और उनका परिवार उठा रहा है। उनका आरोप है कि शराब पीने के एक मामले में कुदरा पुलिस ने जिस तरह कार्रवाई की, उसने कानून से ज्यादा "खौफ" का प्रदर्शन किया।

पीछे से कॉलर पकड़कर खींचा, अपहरण समझ किया विरोध

पीड़ित लखन चौधरी के मुताबिक, उन्होंने थम्सअप पी थी और जांच में थोड़ी मात्रा में शराब मिलने की बात पुलिस ने कही। इसके बाद वे मालवीय भट्ठे से तेलारी बाजार चाय पीने पहुंचे थे। इसी दौरान, उनके अनुसार, कुदरा थाना का ड्राइवर अभिषेक कुमार सादे कपड़ों में आया और बिना कोई पहचान बताए पीछे से उनका कॉलर पकड़कर खींचने लगा।

लखन का कहना है कि आसपास कोई पुलिस वाहन भी नहीं था और सामने वाला वर्दी में भी नहीं था। ऐसे में उन्हें लगा कि कोई उनका अपहरण करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने विरोध किया तो कथित तौर पर उन्हें जमीन पर पटक दिया गया और कई पुलिसकर्मियों ने लाठियों से बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया।

शरीर पर चोट के निशान, आंख और पैरों में गंभीर चोट

परिजनों का दावा है कि पिटाई इतनी बुरी तरह की गई कि लखन चौधरी के दोनों पैरों और आंखों पर गंभीर चोटें आईं। शरीर पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह है कि अगर आरोपी शराब के नशे में था और पुलिस कार्रवाई कर रही थी, तो क्या इतनी मारपीट आवश्यक थी? क्या कानून गिरफ्तारी की अनुमति देता है या सजा देने की?

पत्नी का आरोप- अस्पताल से भी जबरन उठा ले गई पुलिस

पीड़ित की पत्नी चिंता देवी ने पुलिस पर और भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पिटाई के बाद लखन को पहले सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने हालत गंभीर देखते हुए भभुआ सदर अस्पताल रेफर कर दिया।परिजनों का आरोप है कि रातभर इलाज चलने के बाद सुबह कुदरा पुलिस फिर अस्पताल पहुंची और घायल लखन को जबरन वहां से उठा ले गई। इतना ही नहीं, उन्हें पूरा इलाज और जरूरी दवाइयां भी नहीं लेने दी गईं। बाद में शराब पीने का मामला दर्ज कर उनका चालान कर दिया गया। अगर ये आरोप सही हैं तो सवाल उठता है कि क्या किसी घायल व्यक्ति का इलाज पूरा होने से पहले उसे अस्पताल से उठाना कानून सम्मत है?

कोर्ट से जमानत के बाद पहुंचे एसपी कार्यालय

कोर्ट से जमानत मिलने के बाद लखन चौधरी अपने परिवार और गांव के लोगों के साथ कैमूर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसपी) कार्यालय पहुंचे। वहां उन्होंने पूरे मामले की शिकायत करते हुए निष्पक्ष जांच और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। परिजनों का कहना है कि उन्हें स्थानीय स्तर पर न्याय नहीं मिला, इसलिए अब जिला पुलिस प्रमुख से उम्मीद है कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी।

पुलिस का पक्ष भी जानिए

इस पूरे मामले पर मोहनिया के प्रभारी डीएसपी दयानंद कुमार ने कहा कि घटना की जानकारी संबंधित थाने से ली जा रही है। मामले की जांच कराई जाएगी और जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलिस ने पिटाई के आरोपों की पुष्टि नहीं की है। मामले की जांच जारी है।

सबसे बड़ा सवाल...

इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर पुलिस कार्रवाई कर रही थी तो संबंधित कर्मी ने अपनी पहचान क्यों नहीं बताई? सादे लिबास में बिना परिचय दिए किसी को पकड़ना क्या सही प्रक्रिया है? विरोध करने पर कथित तौर पर इतनी बर्बर पिटाई क्यों की गई? घायल व्यक्ति का इलाज पूरा होने से पहले अस्पताल से ले जाने की जरूरत क्या थी? क्या शराब पीने के आरोपी के भी संवैधानिक अधिकार नहीं हैं?

इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे। फिलहाल यह मामला कैमूर में पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर बहस छेड़ रहा है। यदि पीड़ित परिवार के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की पिटाई का मामला नहीं, बल्कि कानून लागू करने के तरीके पर भी बड़ा सवाल होगा। वहीं यदि जांच में पुलिस की कार्रवाई नियमानुसार पाई जाती है, तो तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने आएगा। ऐसे में अब सबकी नजर एसपी स्तर की जांच और उसके निष्कर्ष पर टिकी है।