JAMUI: किऊल-जसीडीह रेलखंड पर मलयपुर थाना क्षेत्र के तीन पुलिया के समीप हुए दर्दनाक हादसे में दो सगे नाबालिग भाई-बहन की मौत के बाद सामने आई तस्वीर ने सरकारी व्यवस्था और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। ट्रेन की चपेट में आने से दोनों मासूमों की मौके पर ही मौत हो गई, लेकिन इसके बाद उनके शवों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए कथित तौर पर ना तो एंबुलेंस नसीब हुआ और ना ही शव वाहन। आखिरकार परिजनों को बांस-बल्ले के सहारे शवों को कंधे पर लादकर गांव तक ले जाना पड़ा।


मृतकों की पहचान खैरा थाना क्षेत्र के डुमरकोला निवासी गणेश रविदास की 16 वर्षीया बेटी करिश्मा और 9 वर्षीय बेटे विशाल के रूप में हुई है। बताया गया कि गणेश रविदास बेंगलुरु में मजदूरी करते हैं, जबकि उनकी पत्नी बच्चों के साथ अपने मायके रविदास टोला देवाचक में रहती थीं। घटना रेलवे पोल संख्या 393/33 और 393/34 के बीच की बताई जा रही है। सूचना मिलने पर मलयपुर थाने की पुलिस चौकीदार के साथ घटनास्थल पर पहुंची और दोनों शवों को कब्जे में लिया। पोस्टमार्टम के लिए शवों को सदर अस्पताल भेजा जाना था, लेकिन वाहन की व्यवस्था नहीं हो सकी।


ऐसे में मृत बच्चों के नाना और मामा संजय रविदास ने बांस-बल्ले के सहारे दोनों शवों को कंधे पर उठाया और घटनास्थल से गांव तक ले गए। कुछ समय पहले जिन बच्चों को परिवार ने जिंदा देखा था, उनके शवों को इस तरह ढोने का दृश्य बेहद मार्मिक था।


गांव पहुंचने के बाद भी परेशानी खत्म नहीं हुई। सदर अस्पताल ले जाने के लिए निजी वाहन भी तत्काल उपलब्ध नहीं हो सका। घंटों तक शव गांव में पड़े रहे। बच्चों की मौत से मां बार-बार बेसुध हो रही थीं और परिजन मातम में डूबे थे। स्थानीय जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप और काफी मशक्कत के बाद टोटो वाहन की व्यवस्था हुई, जिसके बाद दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेजा गया।


मलयपुर थानाध्यक्ष शेखर सौरभ ने बताया कि शवों को अस्पताल भेजने के लिए एंबुलेंस उपलब्ध कराने हेतु प्रखंड चिकित्सा पदाधिकारी से कहा गया था। इसके बावजूद घटनास्थल पर एंबुलेंस क्यों नहीं पहुंची, यह समझ से परे है।वहीं, प्रखंड चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. विजय कुमार ने बताया कि एंबुलेंस का उपयोग सड़क दुर्घटना में घायल मरीजों और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए किया जाता है। रेल दुर्घटना में मृत लोगों के शव ले जाने के लिए शव वाहन की व्यवस्था होती है। लेकिन हैरानी की बात है कि शव वाहन भी नसीब नहीं हुआ, जो व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।