गोपालगंज: आम दिनों में जहां पुलिसकर्मी खाकी वर्दी में कानून-व्यवस्था संभालते नजर आते हैं, वहीं बिहार के गोपालगंज जिले का एक थाना साल में एक दिन बिल्कुल अलग रंग में दिखाई देता है। सावन पूर्णिमा के दिन यहां खाकी की जगह पीली धोती नजर आती है और थाना प्रभारी भी पुलिस अधिकारी नहीं, बल्कि पूजा के यजमान की भूमिका में दिखते हैं।
यह अनोखी परंपरा गोपालगंज के कुचायकोट थाने की है। हर साल सावन पूर्णिमा, यानी रक्षाबंधन के दिन थाना परिसर में सती माता की पूजा आयोजित की जाती है। पुलिसकर्मी और स्थानीय ग्रामीण मिलकर पूजा करते हैं। मान्यता है कि यह परंपरा अंग्रेजों के शासनकाल से चली आ रही है और करीब 160 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है।
सावन पूर्णिमा आते ही बदल जाता है थाने का माहौल
साल के बाकी दिनों में कुचायकोट थाना पुलिस की गतिविधियों, फरियादियों और कानून-व्यवस्था को लेकर व्यस्त रहता है। लेकिन सावन पूर्णिमा के दिन थाना परिसर का दृश्य पूरी तरह बदल जाता है। सुबह से ही पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। थाना परिसर को सजाया जाता है और पूजा की सामग्री जुटाई जाती है। पुलिसकर्मी व्यवस्था संभालने के साथ धार्मिक अनुष्ठान की तैयारियों में भी जुट जाते हैं। आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
इस दिन सबसे खास नजारा थाना प्रभारी का होता है। थानेदार खाकी वर्दी छोड़कर पीली धोती पहनते हैं और पूजा में यजमान बनकर बैठते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार और पूरे विधि-विधान के साथ सती माता की पूजा की जाती है। पूजा संपन्न होने के बाद प्रसाद वितरण और भंडारे का आयोजन होता है। खास बात यह है कि सावन पूर्णिमा के दिन कुचायकोट थाने में जो भी थाना प्रभारी तैनात होता है, वह इस पुरानी परंपरा को निभाता है।
1865 से जुड़ी है सती माता की कहानी
इस परंपरा की शुरुआत को लेकर अलग-अलग बातें कही जाती हैं। पुलिसकर्मियों और स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परंपरा वर्ष 1865 से चली आ रही है। हालांकि, मंदिर की स्थापना और इस धार्मिक मान्यता के इतिहास को लेकर अलग-अलग दावे हैं। लेकिन एक बात पर सभी की सहमति है कि सावन पूर्णिमा के दिन सती माता की पूजा यहां लंबे समय से होती आ रही है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, वर्ष 1865 में कुचायकोट के रहने वाले कवल यादव की अचानक मौत हो गई थी। गांव के लोग उनके अंतिम संस्कार की तैयारी करने लगे। शव को चिता पर रखा गया, लेकिन काफी कोशिशों के बावजूद चिता में आग नहीं लगी।
जब कवल यादव की पत्नी को पति की मौत की जानकारी मिली तो वह चिता स्थल पर पहुंचीं। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, उन्होंने अपने पति के शव को गोद में लिया और चिता पर बैठ गईं। इसके बाद चिता में अपने आप आग लग गई। इसी घटना को स्थानीय लोग सती माता से जोड़कर देखते हैं। बाद में इस स्थान पर मंदिर की स्थापना हुई और समय के साथ थाना परिसर भी इसी क्षेत्र में विकसित हुआ। आज भी उसी मान्यता से जुड़ी पूजा हर साल सावन पूर्णिमा के दिन आयोजित की जाती है।
पुलिस और ग्रामीण मिलकर निभाते हैं परंपरा
यह पूजा सिर्फ पुलिस विभाग का कार्यक्रम नहीं है। इसमें स्थानीय ग्रामीणों की भी बड़ी भागीदारी रहती है। पूजा की तैयारी से लेकर प्रसाद वितरण और भंडारे तक में पुलिस और ग्रामीण एक साथ नजर आते हैं। पुलिसकर्मी कृष्णा यादव के अनुसार, थाने का पूरा स्टाफ और स्थानीय लोग मिलकर पूजा का आयोजन करते हैं। लोगों की आस्था है कि सती माता से सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है।
वहीं पुलिसकर्मी राजेश पांडे बताते हैं कि वर्ष 1865 से सती माता की पूजा की परंपरा चली आ रही है। उनका कहना है कि पुराने समय में भी थानेदार और प्रशासनिक अधिकारी इस धार्मिक आयोजन में शामिल होते थे। स्थानीय मान्यता है कि पूजा के आयोजन से थाना और आसपास के इलाके में पूरे साल शांति बनी रहती है। यही कारण है कि बदलते समय के बावजूद यह परंपरा आज भी जारी है।
रक्षाबंधन पर जुटता है पूरा थाना परिवार
सावन पूर्णिमा के दिन कुचायकोट थाना किसी धार्मिक आयोजन स्थल जैसा नजर आता है। पुलिसकर्मी अपनी नियमित जिम्मेदारियों के साथ-साथ पूजा की व्यवस्था भी संभालते हैं। ग्रामीण परिवारों के साथ पहुंचते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। पुलिसकर्मियों का मानना है कि सती माता की पूजा से थाने में तैनात अधिकारियों और जवानों पर माता की कृपा बनी रहती है। स्थानीय पुलिसकर्मी जसवंत कुमार के मुताबिक, हर रक्षाबंधन के दिन यहां माता की पूजा धूमधाम से की जाती है और दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं।
अंधविश्वास या आस्था, लेकिन परंपरा आज भी कायम
आधुनिक और वैज्ञानिक दौर में ऐसी मान्यताओं को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है। कोई इसे गहरी धार्मिक आस्था मानता है तो कोई इसे अंधविश्वास की नजर से देखता है। लेकिन कुचायकोट थाने के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी परंपरा और स्थानीय आस्था का हिस्सा बन चुका है।
सावन पूर्णिमा के दिन जब खाकी वर्दी पहनकर कानून की रक्षा करने वाले पुलिसकर्मी पीली धोती में पूजा की व्यवस्था करते नजर आते हैं और थाना प्रभारी खुद यजमान बनकर अनुष्ठान में बैठते हैं, तो कुचायकोट थाना बिहार की एक ऐसी अनोखी तस्वीर पेश करता है, जहां कानून की खाकी और आस्था की पीली धोती एक साथ दिखाई देती है। करीब 160 साल पुरानी इस परंपरा ने समय के साथ अपना स्वरूप जरूर बदला होगा, लेकिन सावन पूर्णिमा आते ही कुचायकोट थाने में आज भी वही आस्था, वही पूजा और वही परंपरा जीवंत हो उठती है।