Success Story: गया के मानपुर की सहजानंद सरस्वती कॉलोनी में रहने वाले 9 साल के रामकृष्ण की आवाज ने उनकी उम्र से कहीं आगे की पहचान बना ली है. छोटी सी उम्र में सात भाषाओं में गाने की क्षमता और अलग-अलग संगीत विधाओं में रुचि ने उन्हें खास बना दिया है. हिंदी के अलावा वह गुजराती, बांग्ला, मराठी, हरियाणवी, पंजाबी और राजस्थानी में भी गीत प्रस्तुत करते हैं. देश के कई मंचों के साथ नेपाल में भी उन्हें कार्यक्रमों के लिए आमंत्रित किया जा चुका है.
रामकृष्ण की संगीत यात्रा की एक और खास बात है उनकी जुड़वा बहनें राधा कृष्ण और राधे कृष्णा. दोनों बहनें भी संगीत सीख रही हैं और कई मौकों पर रामकृष्ण के साथ मंच साझा करती हैं. तीनों भाई-बहनों की जुगलबंदी कार्यक्रमों में लोगों का ध्यान खींचती है.
रामकृष्ण के परिवार के अनुसार, बचपन से ही उनकी रुचि संगीत में थी. बेटे की इस प्रतिभा को देखते हुए पिता मनीष कुमार ने उन्हें संगीत की शिक्षा दिलानी शुरू की. मनीष कुमार पहले स्कूल चलाते थे. उन्होंने रामकृष्ण को बनारस घराने की संगीत परंपरा से जोड़ा, जहां उन्होंने गायकी के साथ अलग-अलग वाद्य यंत्रों की भी शिक्षा ली.
रामकृष्ण की मां कीर्ति सागर बताती हैं कि संगीत की शुरुआती शिक्षा उन्हें विवेक सिन्हा से मिली. करीब पांच से साढ़े पांच साल की उम्र में ही उन्होंने बड़े मंचों पर प्रस्तुति देना शुरू कर दिया था. कम उम्र में रांची में हुए एक कार्यक्रम में भी उन्होंने प्रस्तुति दी थी.
सात भाषाओं में गाते हैं गीत
रामकृष्ण की सबसे अलग पहचान उनकी बहुभाषी गायकी है. वह हिंदी के साथ गुजराती, बांग्ला, मराठी, हरियाणवी, पंजाबी और राजस्थानी में भी गीत गाते हैं. इसके अलावा भजन, गजल, लोकगीत, भोजपुरी, मैथिली और देशभक्ति गीतों में भी उनकी रुचि है.
संगीत को लेकर उनकी दिलचस्पी केवल गायकी तक सीमित नहीं है. रामकृष्ण खुद भी गीत लिखते हैं. उनके लिखे गीतों में भक्ति, देशभक्ति और सामाजिक जागरूकता जैसे विषय शामिल हैं. सावन के दौरान उन्होंने देवघर और कांवड़ यात्रा से जुड़ा गीत भी लिखा और प्रस्तुत किया था.
गीतों के जरिए नशे के खिलाफ जागरूकता
रामकृष्ण सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी गायकी के जरिए लोगों तक संदेश पहुंचाने की कोशिश करते हैं. नशे के खिलाफ जागरूकता वाले गीतों के जरिए वह लोगों को इससे दूर रहने का संदेश देते हैं.
परिवार के अनुसार, वर्ष 2025 में शुरू किए गए नशा मुक्त भारत अभियान से जुड़े कार्यक्रमों में भी रामकृष्ण ने हिस्सा लिया और गीतों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया.
कई मंचों पर मिल चुका सम्मान
कम उम्र में रामकृष्ण को कई मंचों पर सम्मान मिल चुका है. परिवार के अनुसार, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की ओर से उन्हें दो बार ‘यूपी गौरव अलंकरण सम्मान’ दिया गया है. इसके अलावा बिहार प्रतिभा सम्मान और बिहार मिथिला सम्मान समेत कई अन्य सम्मान भी उन्हें मिल चुके हैं.
रामकृष्ण काशी सांसद सांस्कृतिक महोत्सव 2025 में उपशास्त्रीय संगीत के विजेता भी रहे हैं. बिहार, झारखंड और नेपाल में आयोजित कई कार्यक्रमों में उन्हें प्रस्तुति देने का अवसर मिला है.
रामकृष्ण की जुड़वा बहनें राधा कृष्ण और राधे कृष्णा भी संगीत की शिक्षा ले रही हैं. तीनों भाई-बहन कई कार्यक्रमों में एक साथ प्रस्तुति देते हैं. परिवार के मुताबिक, तीनों बच्चों की संगीत में गहरी रुचि है और उन्हें लगातार प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
मंच पर तीनों की साथ प्रस्तुति रामकृष्ण की कहानी को और खास बनाती है. जहां एक तरफ रामकृष्ण अपनी गायकी से पहचान बना रहे हैं, वहीं उनकी दोनों बहनें भी संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं.
रामकृष्ण की मां के अनुसार, कार्यक्रमों से होने वाली आय का कुछ हिस्सा जरूरतमंद लोगों की मदद में भी लगाया जाता है. परिवार की ओर से वृद्धाश्रम और कुष्ठाश्रम में दान करने की बात कही गई है. रामकृष्ण पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेते हैं.
परिवार के अनुसार, रामकृष्ण का नाम प्रधानमंत्री बाल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया है. पिता मनीष कुमार का कहना है कि वह चाहते हैं कि उनका बेटा और उसकी दोनों बहनें संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ें और गया के साथ बिहार और देश का नाम रोशन करें.
रामकृष्ण की पसंदीदा गायिका मैथिली ठाकुर हैं. शास्त्रीय संगीत से शुरुआत करने के बाद वह अब भजन, लोकगीत, भोजपुरी, मैथिली और देशभक्ति गीतों समेत कई तरह के संगीत में अपनी प्रस्तुति दे रहे हैं.