DARBHANGA:सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार का दावा आए दिन सरकार और विभाग के मंत्री करते हैं, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत ग्राउंड जीरो पर जाने के बाद दिखाई देती है। दरभंगा के अलीनगर की विधायक मैथिली ठाकुर के इलाके की हैरान करने वाली एक तस्वीर सामने आई है।


किरतपुर प्राथमिक विद्यालय की यह तस्वीर अपने पीछे कई सवाल खड़ा कर रही है। यह स्कूल पूरी तरह जुगाड़ टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है। स्कूल का भवन पूरी तरह से जर्जर हो चुका है, बेंच और डेस्क पर स्कूल का पिलर टिका हुआ है। जुगाड़ टेक्नोलॉजी के सहारे 191 बच्चों की जान को जोखिम में डालकर इस स्कूल का संचालन किया जा रहा है। हालांकि इस समस्या को स्थानीय विधायक मैथिली ठाकुर विधानसभा में उठा चुकी है लेकिन आज भी इसकी स्थिति जर्जर और खतरनाक बनी हुई है। यहां कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। 


वैसे भी यह कहा जाता है कि जब तक बिहार में कोई हादसा नहीं हो जाता है, तब तक किसी का ध्यान उस ओर नहीं जा पाता है। वही हाल दरभंगा के अलीपुर स्थित किरतपुर प्राथमिक विद्यालय की है। जिसकी जर्जर स्थिति में आज तक कोई सुधार नहीं हो पाया है। जबकि क्षेत्र की विधायक इस संबंध में सदन अपनी आवाज उठा चुकी है। 


 इस स्कूल का पिलर पूरी तरह जर्जर होकर ध्वस्त हो चुका है। नया पिलर बनाने के बजाय जुगाड़ टेक्नोलॉजी अपनाया गया। कंक्रीट का नया पिलर बनाने की जगह बेंच-डेस्क और ईंटों को रखकर सहारा दिया गया। इसी जुगाड़ के सहारे छत के एक हिस्से का भार टिका हुआ है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इसी रास्ते से गुजरते हैं और नीचे बैठकर भोजन भी करते हैं। ऐसे में किसी भी समय हादसे की आशंका बनी हुई है।


स्कूल भवन की हालत सिर्फ एक पिलर तक सीमित नहीं है। छत से बारिश का पानी टपकता है, जगह-जगह प्लास्टर उखड़ चुका है, बीम और पिलर जर्जर हैं और सरिया तक दिखाई देने लगे हैं। कई हिस्सों से प्लास्टर गिर चुका है। जर्जर भवन के कारण बच्चों के साथ-साथ शिक्षक भी डर के माहौल में पढ़ाने को मजबूर हैं।


स्कूल में कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई होती है और करीब 191 बच्चे नामांकित हैं। नियमानुसार कम से कम छह कमरों की जरूरत है, लेकिन फिलहाल स्कूल के पास महज दो कमरे हैं। इनमें एक कमरे में कार्यालय चलता है, जबकि दूसरे कमरे में एक साथ कई कक्षाओं का संचालन किया जाता है। एक ही कमरे में कक्षा एक, दो और तीन के बच्चों को एक साथ पढ़ाया जा रहा है। जगह के अभाव में अन्य कक्षाएं बरामदे या खुले स्थान में संचालित करनी पड़ती हैं।


हैरानी की बात यह भी है कि जिस कमरे में बच्चों की पढ़ाई होती है, उसी कमरे में लकड़ी का जलावन और गोबर के उपले रखे हुए दिखाई दिए। इससे स्कूल के रखरखाव और बच्चों के लिए उपलब्ध शैक्षणिक वातावरण पर भी सवाल उठ रहे हैं।


स्कूल के सहायक शिक्षक पवन कुमार चौधरी के मुताबिक, भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है और इसकी जानकारी विभाग के अधिकारियों से लेकर वरीय अधिकारियों तक दी जा चुकी है। ग्रामीण भी कई बार धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं। उनका कहना है कि ध्वस्त पिलर की जगह बेंच-डेस्क और ईंटों से अस्थायी सहारा दिया गया है, लेकिन इससे खतरा टला नहीं है।


शिक्षक के अनुसार स्कूल में कुल 10 शिक्षक और 191 विद्यार्थी हैं। हालांकि जनगणना कार्य सहित अन्य कारणों से सभी शिक्षकों की उपस्थिति हर दिन एक जैसी नहीं रहती। वहीं, शिक्षक संजीव कुमार ने बताया कि जगह की कमी के कारण एक कमरे में तीन कक्षाओं को एक साथ पढ़ाना पड़ रहा है, जिससे पढ़ाई में परेशानी होती है।


स्थानीय ग्रामीण और अभिभावक दुखी कुमार यादव ने कहा कि भवन निर्माण को लेकर ग्रामीण कई बार आवाज उठा चुके हैं और धरना-प्रदर्शन भी किया गया है। उनका कहना है कि जर्जर भवन के कारण अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से भी डर रहे हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से स्कूल भवन का निरीक्षण कर जल्द नया भवन बनाने की मांग की है।


वहीं, पांचवीं कक्षा की छात्रा राधिका कुमारी ने बताया कि शिक्षक अच्छी तरह पढ़ाते हैं, लेकिन स्कूल की बिल्डिंग खराब होने के कारण हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं भवन गिर न जाए। दूसरी कक्षा की छात्रा आरोही कुमारी ने भी बारिश के दौरान छत से पानी टपकने की बात कही।


स्थानीय स्तर पर यह भी बताया गया कि स्कूल भवन के जर्जर होने का मामला विधानसभा में भी उठाया गया है और अब जिला स्तर से भवन को ध्वस्त कर नए निर्माण की प्रक्रिया शुरू किए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि स्कूल भवन के पुनर्निर्माण की ठोस समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है। अब सवाल यह उठता है आखिर कब तक 191 बच्चे इस जर्जर भवन के नीचे पढ़ाई करेंगे। कब तक बेंच-डेस्क और ईंटों के सहारे छत के वजन को रोकने की जुगाड़ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा?  

दरभंगा से गिरिश कुमार की रिपोर्ट

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