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16-Jan-2025 10:00 AM
By HARERAM DAS
Pragati Yatra : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों प्रगति यात्रा पर निकले हुए हैं। सीएम के इस यात्रा का बजट करोड़ों में है। इसकी वजह है कि सीएम कई जगहों पर उद्घाटन और शिलान्यास कर रहे हैं। ऐसे में सीएम नीतीश कुमार को 18 जनवरी 2025 को बेगूसराय जिले के मंझौल अनुमंडल जाने वाले हैं और यहां एक अस्पताल का भी उद्घाटन करने वाले हैं। अब इसी हॉस्पिटल से जुड़ी एक सच को हम आज आपके सामने लाने हैं ताकि यह मालूम चलें कि इस सरकार में लालफीताशाही किस कदर है या फिर सरकार कितनी सजग है।
तीन टर्म के कार्यकाल में नहीं पूरा हुआ काम
बिहार में अक्सर राजनेताओं के तरफ से सुनने को मिलता है कि पहले से काफी 'प्रगति' हुई है। यही वजह है की राज्य के मुखिया इसी नाम की एक यात्रा भी कर रहे हैं। लेकिन, उनके इस यात्रा की बानगी क्या है और सूबे में कितनी प्रगति हुई है इसे आप इस एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि सूबे में एक अस्पताल के निर्माण की स्वीकृति 2007 में मिलती है और उसके लगभग दो साल बाद इसका शिलान्यास होता है यानी 2009 में शिलान्यास करवाया जाता है ताकि लोगों को यह भरोसा हो कि अब यहां भी अस्पताल का निर्माण होगा और लोगों को अब अपने इलाज के लिए दूर -दराज नहीं जाना होगा। लेकिन अब सरकार की 'प्रगति' देखिए कि इसके निर्माण में 16 साल लग गए। मतलब सीधे शब्दों में कहें तो एक राजनेता के तीन बार के कार्यकाल से भी एक महीना अधिक लग गया है।
समझिए पुरे मामले को विस्तार से
अब हम आपको इस पूरे मामले को थोड़ा और विस्तार से समझाते हैं। दरअसल, बिहार के बेगूसराय जिला अंतर्गत मंझौल अनुमंडल है और लगभग लाखों की आबादी इस अनुमंडल में होगी। ऐस में इस बातों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2007 में यहां अनुमंडलीय अस्पताल के निर्माण की स्वीकृति प्रदान की गई। उस समय भी सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही थे और उस स्वास्थ्य मंत्री हुआ करते थे चंद्रमोहन राय। सबसे बड़ी बात यह कि मंझौल इनका ननिहाल है और जब यह ननिहाल आए तो इनसे अस्पताल की मांग की गई और इन्होनें वहीं भरी सभा में यह एलान कर दिया की मंझौल में अस्पताल का निर्माण करवाया जाएगा।
ननिहाल के लोगों को दिया गिफ्ट
ऐसे में चंद्रमोहन राय से उस समय यानी 2007 में इसके निर्माण के लिए लगभग 5 करोड़ यदि पूरी राशि की बात करें तो 4 करोड़ 91 लाख करोड़ रुपए की मंजूरी प्रदान की और इसके दो साल बाद यानी जनवरी 2009 में अस्पताल निर्माण के लिए शिलान्यास करवाया गया। इसके बाद 2012 तक काफी तेजी से काम चला। इस दौरान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही थे। लेकिन,अचानक से इसका निर्माण कार्य रोक दिया गया और कहा गया कि बजट की राशि कम है। इसके बाद इसे रिवाइज किया गया।
अय्याशी का अड्डा और कचरा भवन बना अस्पताल
वहीं, इस अस्पताल के निर्माण के लिए फिर 14 मार्च 2013 को भवन निर्माण को लेकर निर्धारित कार्य के लिए कुल पांच करोड़ 51 लाख 93 हजार की स्वीकृति प्रदान की थी। जिसके बाद फिर काम शुरू हुआ लेकिन 2014 में फिर काम अधर में लटक गया और इस समय भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही थे। जिसके बाद वर्ष 2017 में योजना को पूर्ण करने के लिए पुनरीक्षित प्राक्कलन राशि साढे पांच करोड़ से बढाकर, सात करोड़ 63 लाख 26 हजार 887 रुपए करने का प्रस्ताव अधीक्षण अभियंता भवन अंचल दरभंगा को समर्पित की गई है। इसके बाद इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। ऐसे में यह अर्धनिर्मित भवन अय्याशी का अड्डा और कचरा भवन बनकर रह गया।
इसके बाद साल 2021 में विधानसभा और विधान परिषद में विधायक और विधान पार्षदों ने अस्पताल के उद्घाटन को लेकर सवाल उठाया। मतलब स्थानीय राजद विधायक राजवंशी महतो और तत्कालीन भाजपा के एमएलसी रजनीश कुमार ने बिहार विधान मण्डल के दोनों सदनों में अनुमंडलीय अस्पताल मंझौल को लेकर प्रश्न उठाया था। तब स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने उत्तर बताया था कि 75 बेड वाले अनुमंडलीय अस्पताल मंझौल के सम्बन्धी शेष कार्यों को पूर्ण कराये जाने के सम्बंध में विभागीय स्तर पर समीक्षा की गई। इसे 6 माह के अंदर पूर्ण कराने के लिए भवन निर्माण विभाग से अनुरोध किया था। लेकिन, छह महीने के बदले तीन साल कार्य पुरे होने में लग गए। इसके बाद अब लगभग 11 करोड़ की राशि से 16 साल बाद अस्पताल बनकर तैयार हुआ है। मतलब समझ सकते हैं बिहार के स्वास्थ्य विभाग में या सरकारी महकमे में प्रगति की रफ़्तार क्या है?
67 हज़ार वोटों से मिली जीत फिर भी नहीं गया ध्यान
अब इन तमाम बिंदुओं पर नजर डालें तो गौर करने वाली बात यह है कि इस दौरान गद्दी पर न सिर्फ एनडीए के नेता रहे बल्कि महागठबंधन के नेता भी बैठे और वर्तमान के नेता विपक्ष भी स्वास्थ्य विभाग की कमान संभाले और सबसे बड़ी बात यह है कि इस इलाके के विधायक भी राजद से हैं और लगभग 67 हज़ार वोटों से जीत भी हासिल हुई है। इसके बाद भी उन्होंने तेजस्वी के स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए इसको लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। महज एक दफे खानापूर्ति के लिए उन्होंने विधानसभा में सवाल उठाया।
इधर, इस पुरे मामले में गौर करने वाली बात तो यही है कि जिस बिहार में एक अस्पताल के निर्माण में 16 वर्ष का समय लगता हो वहां मरीज बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की उम्मीद करे भी तो कैसे करे। क्योंकि जहां एक लाख की आबादी होने के बाद भी सरकार ने 16 साल बाद महसूस किया हो कि इस इलाके में सच में अस्पताल की जरूरत है और इसलिए लिए हर बार सिर्फ राशि बढ़ाई गयी हो ताकि कुछ लाल फीताशाही से लेकर सफेदपोश लोगों की जेब गर्म रहें तो वहां लोग कैसे यह समझे हैं कि सरकार हमारे लिए सजग हैं और सच में बिहार में प्रगति हुआ है और यह यात्रा उसके लिए ही निकाला गया है।